तुम्हारे पास

तुम्हारे पास दास्तां सुनने
को वक्त नहीं….
तो हमारे पास भी
कहने को कोई लफ्ज़ नहीं….

अगर बसा लिया है
तूने गैरों को घर में
तो मेरे दिल में भी
तू कमबख्त नहीं ….

वो और होते होंगे
इश्क में मर मिटने वाले
मैं तेरे प्यार में कटूंगी
अपनी नब्ज़ नहीं….

तू चाहता होगा
तेरे लिए खुद को
मै बदल दूंगी तो
इतनी नासमझ मैं कमबख्त नहीं …

तू सुई मैं धागा बन
सिल रही थी ज़ख्म
तेरी चुभन से होता था
मुझको कष्ट नहीं…..

थे गलीचे सुखाने कुछ
गलतफहमियों के वर्ना
तेरे आंगन में रखते हम
कदम सख्त नहीं….

Published in हिन्दी-उर्दू कविता

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