द्रोपदी

जिसका जन्म हुआ यज्ञ
की प्रज्वलित अग्नि से
जो द्रुपद की पुत्री कहलाई
फूलों की नर्म सेज पर सोई
एक दिन हुई पराई
जिसके स्वयंवर में स्वयं
कृष्ण जी आये
वनवासी अर्जुन ही
मछली की आँख भेद पाये
अति सुन्दर द्रोपदी को लेकर
कुन्ती के पास ले आये
कुन्ती की आज्ञा से द्रोपदी
पाँच भाईयों की भार्या हो गई
और जगत में पान्चाली
कहलाई
जुये में पत्नी को हारे
धर्मराज युधिष्ठिर
सबके बीच में वह
अपमानित हुई बेचारी
कृष्ण जी ने एक-एक धागे
का मूल्य चुकाया
पाण्डु कुलवधू की
भरी सभा में लाज़ बचाई
अपमान का घूँट पीकर
द्रोपदी ने प्रतिज्ञा ली
नित खुले रहेगे केश
जब तक प्रतिशोध ना लूंगी
दु:शासन की छाती के
लहू से अपने
कलंकित केश धुलूँगी
नारी जाति की साहसी वीरांगना
थी द्रोपदी
जिसे महाभारत का उत्तरदाई
आज भी है ठहराया जाता
परंतु वह नारी तो
अति सम्माननीय थी
जो सदा घृणा से देखी जाती रही है ।


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7 Comments

  1. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - May 22, 2020, 7:06 am

    Nice

  2. Dhruv kumar - May 22, 2020, 9:23 pm

    Nyc

  3. Abhishek kumar - May 23, 2020, 9:08 pm

    Nyc👏👏👏

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