“नहीं देखा”

ღღ_मोहब्बत करके नहीं देखी, तो ये जहाँ नहीं देखा;
मेरे महबूब तूने शायद, पूरा आसमां नहीं देखा!
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तुझमें खोया जो एक बार, फ़िर मिला नहीं कभी;
खुद की ही तलाश में मैंने, कहाँ-कहाँ नहीं देखा!
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मंज़िल की क्या ख़ता जो, भटकता रहा मैं ही;
की जिधर रास्ता सही था, मैंने वहाँ नहीं देखा!
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मेरे शहर के सब लोग, अमनपसंद हो गये शायद;
एक अरसे से किसी घर से, उठता धुआँ नहीं देखा!
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नासमझ हो तुम “अक्स”, जो मासूम समझते हो;
उनका हुस्न तो देखा तुमने, उनका गुमाँ नहीं देखा!!….‪#‎अक्स‬
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