न जुदाई का भय हो

ठीक कहा तुमने
पायें यदि मानव तन
अगले जनम में,
या बनें, कीट, पतंग,
जंगली जानवर,
अपनों के बीच
अपने हो सकने वालों
के बीच ही जनम पायें।
न जुदाई का भय हो
न दूर चले जाने का गम
न परम्परा की बंदिशें हों
न रूढ़ि की रूढ़िवादिता हो।
बस एक हो पाने में
सरलता ही सरलता हो।


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16 Comments

  1. Pratima chaudhary - September 17, 2020, 11:51 am

    सुन्दर भाव

  2. Geeta kumari - September 17, 2020, 12:12 pm

    क्या बात है कवि ने तो अगले जनम तक की कल्पना कर ली🤔
    सुन्दर प्रस्तुति ..

    • Satish Pandey - September 17, 2020, 7:59 pm

      बहुत बहुत धन्यवाद, गीता जी, सादर अभिवादन

  3. Chandra Pandey - September 17, 2020, 12:22 pm

    वाह वाह, बहुत ही गजब

  4. Piyush Joshi - September 17, 2020, 12:24 pm

    बहुत खूब

  5. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - September 17, 2020, 2:19 pm

    अतिसुंदर

  6. Pragya Shukla - September 17, 2020, 6:34 pm

    ओफ्फो…
    इतना आगे का सोंच लिया

  7. Devi Kamla - September 17, 2020, 6:40 pm

    गजब की पंक्तियाँ

  8. MS Lohaghat - September 17, 2020, 8:27 pm

    बढ़िया, very nice

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