” बच्चे और सपने “

सपनों में बच्चे देखना
सुखद हो सकता है ;
लेकिन ; बच्चों में
सपने देखना आपकी भूल है

जैसे; सपने…… सिर्फ़ सपने
बच्चे : साकार नहीं करते
वैसे ही; बच्चों में सपने
साकार करना फिजूल है.

हाँ ! आप ऐसा करिए;
बच्चों में सपने रोपिए
शिक्षा और संस्कार
कदापि न थोपिए .

आपके सपने —————
चाहे जितने रंगीन हों
आपकी विफलता की कहानी हैं

बच्चों की उडान
उनकी सफलता की निशानी हैं.

आप बच्चों को उड़ने दीजिए
खुले आकाश में——–
तेज हवा और तीखी धूप के बीच
बिन्दास–बेखौफ़– बेतहाशा

बस; डोर उतनी ही खींचिऐ
कि; पतंग……..पथ से भटके नहीं
पेडों की फुनगियों— बिजली की तारों
और भवन— छज्जों पर अटके नहीं.

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Comments

3 responses to “” बच्चे और सपने “”

  1. राम नरेशपुरवाला

    Good

  2. Abhishek kumar

    Nice one

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