बादशाह

कविता- बादशाह
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सजग प्रहरी बनने के लिए,
फिर से कलम उठाया हूं…
अब हमें रोक लो,
लोकतंत्र के बादशाहो तुम!

ना धरना पर बैठूंगा
ना संपत में आग लगाऊंगा|
बस कलम उठाया हूं-
कलम की भाषा में
तुम्हें तुम्हारी औकात बताऊंगा|

सारी घोटाला करतूत तुम्हारी,
देशभक्त हो-
देशभक्त की यह पहचान तुम्हारी|
ना रंग ना कपड़े से,
ना डंडा ना भगवा से,
ना मंदिर ना मस्जिद से,
ना बौद्ध मठ ना गुरुद्वारे से,
पहचान तुम्हारी तब होगी,
जब हर नारी सुरक्षित होगी|

कई मोतियों की माला स्त्री,
कई गले कि शान है,
मत प्रशंसा करो इस माला की ,
नेता इस माला के ना काबिल है|

सबके लिए यह बात नहीं,
इस माले का जो अपमान किया|
कहे “ऋषि” वह स्त्री से ना जन्मा,
वह मुर्गी के अंडे की औलाद हुआ|

— ऋषि कुमार “प्रभाकर”

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Responses

  1. सुंदर रचना है। आखिरी दो पंक्तियों में तो हंसी आ गई
    “फिर से कलम उठाया हूं” के स्थान पर “फिर से कलम उठाई है “करेंगे तो अच्छा दिखेगा।

  2. इक अच्छी कविता, आखिर की पंक्तियों का भाव अस्पष्ट सा लगता है, कृपया समझायें

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