भारत माता

भारत माता

सिसक रही है भारत माता, आॅचल भी कुछ फटा फटा है
चेहरे का नूर कहीं नहीं है,घूंघट  भी कुछ हटा हटा है।।
क्या कारण है, सोचा है कभी? क्यों माॅ इतनी उदास है
गुलामों  सी सहमी खडी, जब आजादी उसके पास है।

पहले चढते थे शीश  सुमन, लहू से तिलक हो जाता था
सफेद आॅचल माॅ का तब लाल चूनर कहलाता था
आॅखों से बहती थी गंगा जमूना, की पावन अमृत द्यारायें
चरणों पे झुककर हिमाचल मस्तक रोत नवाता था।

बोते थे बीज चाॅदी के खेतो में किसान
सोने की फसल लहलहाती थी
पसीने की बूदें मिटटी में गिर
नदिया की द्यार बन जाती थी
अफसोस! मगर आज नही है
खेतों में वो हरियाली
चिडियों की चहचहाट नहीं है,न फूलों कीी है ूुुफूलवारी
अपनों के खून से सींच रहें सब फसले अपनी अपनी
कहीं जमीं पे दबी है जाति,कहीं दबे हेेै द्यर्म असहाय
कहीं होठों पे लगे हैं ताले, कहीें मुठी में बंद आवाजें

ताजों को कुचल रहे पाॅवों तले कुछ सिरफिरे
माॅ बहनों की लाजो को भी चौराहे पर खींच रहें
नाच रही है होके नग्न आज हैवानियत गली गली
मेरे भारत की इन गलियों में आजादी तो कहीं नहीं?

सोचो…..क्या सोचते होंगे, देषभगत जो चले गये
अपने लिये कुछ न मांगा, झोली तुमहारी भर गये
भ्रश्टाचार, अत्याचार, अनाचार..क्या उनके सपने थे
एक एक सब टूट गये वो, कभी लगते जो अपने थे।

ऐसा ही कुछ होता रहा तो वो दिन फिर दूर नही
ज्ंजीरे फिर गुलामी की पांवों की झांझर होंगी
लहू टपकेगा अष्कों से, होठों पे खामोशी  की चाद्धर होगी
सोनचिरैया लुटीपिटी कहीं सिसकियाॅ भरती हेाग

बंजर मुरझायी आस को तकती तब ये द्यरती होगी।

तब न कहना मुझकेा तुम, मैंने आगह नही किया
अरे….इस आजादी को बचा सकॅू…
उसके लिये क्या क्या मेैने नहीं किया

अपने अद्यिकारों के मान की खातिर सडको तक पर जा बैठ

भूख उतार रख दी किनारे, अनशन पर हम आ बैठे
द्यरना दिया,आवाज लगायी,इस गूंगी बहरी सरकारो को
अफसोस मगर कहीं से कोई जबाबा न आया
थक हार के हमने अपना फैसला तब ये बतलाया
कुछ ओर नही तुम कर सकते तो, इतना तो कर दो
हमें संभालने दो राज ये, सिंहासन खाली कर दो।
सिहांसन खाली कर देो।……….

आओ साथियों मिलकर आज ये संकल्प उठा ले
जहाॅ छिपा है रामराज्य, उंगली पकड उसे बुला लें
माना डगर मुष्किल है,पर नामुमकिन नही
ऐसा कौन काम है, जो सेाचे हम ओैर कर न जायें

जयहिंद।
व्ंादनामोदी गोयल फरीदाबाद,

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