सरहद के मौसमों में जो बेरंगा हो जाता है,
तिरंगे से लिपट कर एक दिन वो तिरंगा हो जाता है।।
राही (अंजाना)
Tag: देशभक्ति कविता 2019
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सरहद के मौसमों में जो बेरंगा हो जाता है
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आजादी
सालों पहले मिली आजादी के बाद भी
आज हम खुद से लड़ रहे हैं
हम कैसे मान लें कि हम
प्रगति की ओर आगे बढ़ रहे हैं,कहीं सरहद पर पूरे उत्साह से खड़ा जवान
देश की सेवा के अवसर से गरवांवित है
तो कहीं देश के सीने में शिक्षा देते संस्थानों
की छाती पे खड़े होकर कोई आज़ादी के नारे लगा रहा,पक्ष-विपक्ष के इतिहास को बार-बार
देश को सँभालने वाले दोहरा रहे हैं
समझ नहीं आता क्यों इतने लंबे समय बाद भी
एक दूसरे के अच्छे काम की सराहना नहीं कर पा रहे हैंबिकता मीडिया बार-बार गुमराह करने की
कोई कसर न छोड़ने को तैयार है
विद्या मानकर पूजने वाले कार्य
के साथ ये कैसा व्यवहार है,समझ नहीं आता इनके रोमटे कैसे खड़े हो जाते हैं
जन-गण-मन गाने में
बड़ी सोच में पड़ जाता हूँ मैं
अच्छे बदलाव को थोड़ा भी करीब न पाने में,आशा है और उम्मीद है
मेरा देश एक दिन फिर आज़ाद होगा
सही और गलत में रुपयों की ताकत के बावजूद भी
कोई भेदभाव न होगा,अपना जीवन त्याग चुके हर एक वीर को
मेरा खूब सम्मान है, आज हमारे सुकूँ के
पीछे न जाने कितनों का बलिदान है।।-मनीष
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मैं अमन पसंद हूँ
मैं अमन पसंद हूँ, मेरे शहर में दंगा नहीं शांति रहने दो..!!
लाल और हरे में मत बांटो, मेरी छत पर तिरंगा रहने दो..!!??जयहिन्द??✍वाहिद
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So jaunga khi m aik din…
Kho jaunga khi m aik din
Bo jaunga kuch to m aik din
Hounga na jane kha m
So jaunga khi m aik din.
Mujhe pta h ki kiya hd h meri
Pr dr h khi tod na jaun ose khi aik din.
Nhi h prbha is duniya ki
Khta hu khud se hr aik din
jhooti h ye tsli janta hu m
Pr khi bhool na jaun ise aik din
Haa janta hu m ki
So jaunga khi m aik din… -
जय जननी
जय हे भारत स्वर्ण भूमि जय
जय जननी, जय कर्म भूमि हेगंगा यमुना ब्रह्म सरस्वती
पावन सतलज सिन्ध बहेविन्ध्य हिमालय गिरी अरावली
मणि माणिक नवरत्न भरेजलधि हिन्द बंगाल अरब जल
स्वर्ण भूमि नित अंक भरेआर्य द्रविड़ मंगोल भूमि हे
हिन्दू इसाई यवन मातृ जयजय हे भारत स्वर्ण भूमि जय
जय जननी, जय कर्म भूमि हेवाल्मिक मुनि व्यास कालि कवि
तुलसी सूर कबीर संत स्वरगूँजे धनुष टंकार राम की
गीता का उपदेश गूँजेजय राणा जय शिवा गोविन्द सिंह
जय भारत संतान वीर हेजय हे भारत स्वर्ण भूमि जय
जय जननी, जय कर्म भूमि हे -
जंगे आज़ादी (आजादी की ७०वी वर्षगाँठ के शुभ अवसर पर राष्ट्र को समर्पित)
वर्ष सैकड़ों बीत गये, आज़ादी हमको मिली नहीं
लाखों शहीद कुर्बान हुए, आज़ादी हमको मिली नहींभारत जननी स्वर्ण भूमि पर, बर्बर अत्याचार हुये
माता बहन बेटियों के, इज्ज़त धन सम्मान लुटेबिक गये धरम लुट गये करम, सब ओर गुलामी बू छायी
प्राचीन सभ्यता संस्कृति गौरव, भूल गये हम सच्चाईब्राह्मण कहता हम सर्वशेष्ट, छत्रिय कहता हम शासक है
बनिया कहता हम धन कुबेर, हरिजन अछूत बस सेवक हैमंदिर मस्जिद स्कूल सभी, जाना हरिजन को वर्जित था
ईश्वर था उच्च जातियों का, सब पुण्य उन्हीं को हासिल थाबेकार अगर हो जाय अंग, मानव ताकत घट जाती है
सब लोग दबा सकते उसको, आबरू मान छिन जाती हैभारतजन का एक बड़ा भाग, हमने ही निष्क्रिय कर डाला
शक्तिहीन बना इनको हमने, कमजोर देश को कर डालाहर वर्ग धर्म में फूट डाल, दंगे फ़साद करवाते थे
राजा राजा जनता राजा, हिन्दू मुस्लिम लड़वाते थेआपस में जब फूट पड़ी, अंग्रेजों कि बन आई थी
आज़ादी कैसे मिल सकती, आपस में ठनी लड़ाई थीकुछ रजवाड़े कुछ नेतागड़, गोरों के सिपहसलार बने
कुछ राय बहादुर सर की ताज, बने गोरों के सच्चे बन्देअन्न, कपास जूट लोहा, भर भर जहाज़ ले जाते थे
हर साल नया लंदन बनता, हर साल स्वर्ग बन जाते थेकंगाल हो गया देव भूमि, लाखों भूखे नंगे फिरते
हर साल पड़े बंगला अकाल, हर साल हज़ारों जरे मरेयह देश हमारा अपना था, सब चीज़ यहाँ कि उनकी थी
अंग्रेज़ हमारे स्वामी थे, बेड़ियाँ पैर में जकड़ी थीकानून न्याय सब उनका था, हम बने मूक दर्शक केवल
लाखों बिस्मिल आज़ाद मरे, हम मौन रो रहे थे केवलदेवभूमि उद्धार हेतु, गांधी का अवतार हुआ
भारत जननी स्वर्ण भूमि में, नया रक्त संचार हुआसत्य अहिंसा निर्भयता की, बचपन में शिक्षा पाई
मानव सेवा सर्वशेष्ठ धर्म, माता ने यही सिखाई थीइंग्लैंड गये शिक्षा लेने, आज़ाद मुल्क की हवा मिली
आज़ादी है अनमोल रत्न, जौहरी हृदय को भनक लगीभाषण लिखने पढ़ने की, गोरे केवल अधिकारी थे
पेशा चुनने धन रखने की, केवल वे ही अधिकारी थेकाले हिन्दुस्तानी कुत्ते, दोनों ही एक बराबर थे
होटल गिरजा में जाने से, भारतवासी वर्जित थेगोरे काले का भेद देखकर, गाँधी का दिल भर आया
आज़ादी है एकमात्र लक्ष्य, दिल में यह बात उभर आयाभारत आकर देख दुर्दशा देश की गाँधी रोया
कैसे टूटे लौह बेड़ियाँ, इस विचार में खोयासत्य अहिंसा जन क्रांति का, मार्ग श्रेष्ठ व उत्तम है
मात्रभूमि की मुक्ति अर्थ, बस मार्ग यही सर्वोत्तम हैसत्य अहिंसा शस्त्र ग्रहण कर, आज़ादी रण में कूद पड़ा
आज़ादी का शंख फूंककर, भारत छोड़ो आवाज़ दियालार्ड ह्यूम की कांग्रेस, निर्जीव शक्ति से हीन बनी
कर्मठ नीतिज्ञ नेता अभाववश, जन जन मन से दूर हटीगाँधी का नेतृत्व मिला तो, प्राण शक्ति संचार हुआ
एक नयी शक्ति एक नया जोश, ले कांग्रेस तैयार हुआतैयार हुआ संघर्ष हेतु, अन्याय गुलामी के विरुद्ध
जन जन में जागृति लाने को, चल पड़े कांग्रेसी विश्रुब्धझंडा कांग्रेस नीचे, हर वर्ग किस्म के लोग जुटे
जंजीर गुलामी तोड़ेंगे, लाखों हज़ार कंठ स्वर फूटेनेताजी नेहरु पटेल, राजेन्द्र रत्न अब्दुल कलाम
अम्बेडकर राजा जयप्रकाश, चल पड़े तिरंगा हाथ थामधनवान पुत्र वनिता छोड़े, सब मोह नेह से मुँह मोड़े
आज़ादी की आग जलाने, चल पड़े फकीरी वेश धरेएक नयी चेतना नयी लहर, जन जन में भर आयी थी
उठ खड़ा हुआ सम्पूर्ण देश, आज़ादी की लिप्सा जागीचल पड़ा देश गाँधी पीछे, सब छोड़ मोह माया धन जन
भर गये जेल अंग्रेजों के, अभिमान मान उनके टूटेगाँधी की आवाज़ राह पर, जत्थे के जत्थे निकल पड़े
निज माथ हथेली पर रक्खे, शत शत सहस्त्र इन्सान चलेचल पड़े छोड़ रोते बच्चे, कोई सुहाग की रात तजे
बूढ़े माँ बाप छोड़ कोई, कोई धन राज्य मान छोड़ेमाता बहनों कि फौज़ देख, चल पड़ी पोंछ सिन्दूर माथ
मातृभूमि को मुक्त कराने, चल पड़ी नारियों की बरातनिकल पड़े नवयुवक छोड़, कॉलेज पढ़ाई सब अपनी
आज़ादी की आग जलाने, चल पड़े नवयुवक नवयुवतीछोड़ वकालत कोर्ट चला, कानून पंडितों का जत्था
भूखे नंगे श्रमिकों का, निकल पड़ा पैदल जत्थाछोड़ किसानी चले भूमिधर, व्यापारी व्यापार छोड़ कर
आजादी का दीप जलाने, चले सिपाही कफ़न बांध करमंदिर मस्जिद गुरुदारे, बन गये सभा स्थल सारे
आज़ादी की प्रतिमा को, हर रोज़ पूजते जन सारेहर रोज़ हजारों आते थे, संदेश सुनाये जाते थे
हर गाँव गली में जाकर के, सब लोगों तक पहुँचाते थेदेश में निर्मित अपनी चीज़े ही, भारतवासी अपनाओ
अगर रोकनी ब्रिटिश लूट है, भाई भाव स्वदेशी लाओबहिष्कार कर ब्रिटिश माल का, मोह विदेशी छोड़ो
ब्रिटिश माल की होली फूंको, कानून ब्रिटिश की तोड़ोमाल विदेशी की होली, हर गाँव गली में खूब जली
ब्रिटिश किताबें कपड़े लत्ते, गोरों की सम्मान जलीबहिष्कार कर ब्रिटिश माल का, लोग स्वदेशी अपनाये
हर घर में चरखा चलता था, घर घर वस्त्र बनाते थेजूट कपास चाय कहवा, ब्रिटिश मिलों कि जननी थी
अंग्रेज़ व्यापारी को हमने, इनकार किया इनको देनीब्रिटिश मिलें हो चलीं बंद, लंदन में हाहाकार मचा
चरखा करघा पर रोक लगे, लंदन में आवाज़ उठाब्रिटिश मिलें हो जाय बंद, यह उनको नहीं गँवारा था
खो जाय हाथ से पारसमणी, हरगिज़ यह नहीं गंवारा थाभारत जन के इन कामों से, गोरे शासक थे घबराये
सदियों से दबी जातियों का, उठना कैसे उनको भायेहर रोज़ हजारों चले जेल, हर रोज़ गोलियाँ चलती थी
हर रोज़ सैकड़ों विधवा हों, हर रोज़ चितायें जलती थींजलियाना का बाग़ देख,कुर्बान सैंकड़ों हुए जहाँ
जनरल डायर की गोली से, सिन्दूर हजारों मिटे जहाँखून का हर कतरा कतरा, हर चोट जिस्म पर पड़ा हुआ
गोरी शासन कि नींव ईट, हर रोज़ हिला खोखला करताज्यों ज्यों अत्याचार बढ़े, चिनगारी जोर पकड़ती थी
लाखों शहीद कुर्बान हुए, पर आग लगी न बुझती थीएक ओर खड़े थे शांति वीर, एक ओर क्रांति मतवाले थे
एक ओर अहिंसा के सेवक, एक ओर खून के प्यासे थेआज़ाद भगत सिंह बिस्मिल ने, एक लहर क्रांति की फैलायी
आजादी मस्तक माँग रही, आवाज़ देश भर में छायीबम फेंक अंग्रेजी संसद में, इन्क़लाब भगत सिंह चिल्लाया
सोती जनता की नींद तोड़, गोरी शासन को झकझोरापंजाब के कोने कोने में, इक आग लाजपत ने फूंका
आजादी की समर भूमि में, वह वीर निडर होकर जूझाबलिदान हो गया देश अर्थ, बर्बर शासक के हाथों से
यह खून व्यर्थ नहीं जायेगा, आवाज़ उठी हर बूंदों सेभगत सिंह सुखदेव गुरु, हँसते फांसी पर झूल गये
जय जननी जय कर्मभूमि, जपते आज़ाद कुर्बान हुएदेश पर मरने वालों का, बलिदान रंग लेकर आया
अन्यायी शासन के विरुद्ध, जेहाद देश भर में छायाआज़ादी के रंग मंच पर, गाँधी सुभाष दो नायक थे
सत्य अहिंसा जन क्रांति के, दोनों की सच्चे साधक थेलाहौर कांग्रेस सम्मेलन से, दोनों नेता दो राह चले
सुभाष क्रांति की राह पकड़, कांग्रेस से मुहँ मोड़ेब्रिटिश राज की गिद्ध दृष्टि से, कब तक सुभाष बच सकते थे
शासन की खोजी आखों से, कब तक सुभाष छिप सकते थेपड़ गयी बेड़ियाँ हाथों में, निज घर में बंदी बन बैठे
ब्रिटिश फौज़ के घेरे में, सन्यासी का रूप धरेवह शेर नहीं था जंगल का, जो लौह सींखचों में रहता
वह तो ऐसा अंगारा था, जो नीचे राख नहीं दबताब्रिटिश कैद से निकल पड़े, सब तोड़ गुलामी के बंधन
आज़ादी के हवन कुंड में, चल पड़े जलाने अपना तनसिंगापुर रंगून पहुँच, “आज़ाद हिन्द” का गठन किया
खून के बदले आज़ादी, जन जन को आवाज़ दियाबन गये सिपाही लाखों जन, लाखों ने धन का दान किया
मातृभूमि के चरणों में, लाखों ने जीवनदान दियासिंगापुर, इटली जापान गये, हिन्दुस्तानी मित्रों से मिलने
नापाक ब्रिटिश शासन विरुद्ध, हथियार समर्थन धन लेनेहथियार समर्थन धन लेकर, सेना का विस्तार किया
ब्रिटिश दैत्य से भिड़ने को, “आज़ाद हिन्द” तैयार हुआहे वीर पुत्र भारत माँ के, आज़ादी तुम्हें पुकार रही है
हिम आलय है बाट देखता, दिल्ली तुम्हें निहार रही हैगूंज उठा जय हिन्द हिन्द, सर कफ़न बाँध फौजी निकले
ब्रिटिश हुकुमत थर्रायी, जब आज़ाद हिन्द पलटन निकलेअंडमान निकोबार द्वीप, “काला पानी” कहलाते थे
आज़ादी के दीवानों के, बंदीगृह समझे जाते थेविहँस पड़ी उस समय भूमि, जब झंडा सुभाष ने फ़हराया
रो पड़ा सिंह समकक्ष देख, बंदी वीरों की कृष कायाब्रिटिश दासता के प्रतीक, उन द्वीपों के नव नाम दिये
आज़ादी पा जो हर्षित थे, ‘स्वराज्य’ ‘शहीद’ वे कहलायेनागालैंड तरफ बढ़ गया वीर, सदियों से दास बना जो था
आज़ाद हिन्द गोरी फौजों का, वह प्रांत बना रणस्थल थाललकार उठा वह मस्त सिंह, वीरों जय शीश मांगती है
देखो आज़ादी प्यासी है, वह खून खून चिल्लाती हैबढ़ गए वीर तन मोह छोड़, छोड़े प्रिय जन घर माया
कुर्बान हुये जननी खातिर, संपूर्ण जगत में यश छायावह महायुद्ध की बेला थी, हो गया पराजित जर्मन था
इटली जापान मर चुके थे, विजयी इंग्लैंड मुदित मन थाहाथ दाहिना टूट गया, जब हार गये जापानी
अभाग्य देश का सचमुच था, जय ‘आज़ाद हिन्द’ को मिली नहींजन जन के नेता गाँधी यदि, असहयोग क्रांति को फैलाते
वीरवर सुभाष के युद्ध यज्ञ में, थोड़ा भी खून गिरा पातेउस समय अन्य स्थिति होती, आज़ाद देश हो सकता था
सदियों से बना गुलाम देश, आज़ाद हवा ले सकता थाहार गया आज़ाद हिन्द, भाग्य देश अपना हारा
सो गया देश का पारसमणि , जो बना देश का प्यारा थाबुझ गयी विश्वयुद्ध कि लपटें, नव निर्माणों की बेला थी
पर भारत में सत्य अहिंसा, क्रांति युद्ध की बेला थीइस नयी क्रांति की ज्वाला को, रे कौन बुझा सकता था
सदियों से सोयी जाति जगी, रे कौन कुचल सकता थाथका हुआ बूढा ब्रिटेन, कमजोर शक्ति से हीन बना
अमरीका कम्युनिस्ट रूस, दो नयी शक्ति से दीन बनागोलमेज़ कांफ्रेंस चला, आज़ादी की बात चली
दिन गुजरे हफ्तों गुजरे, पश्चात देश की भाग्य जगीब्रिटेन उस समय शासित था, लेबर के लार्ड ऐटली से
कुछ सहानुभूति जो रखता था, गुलाम देश व दलितों सेआज़ादी से वंचित रखना, ब्रिटेन के वश की बात न थी
पर हिन्दू मुस्लिम भाई भाई, में नफरत की बीजें बोयीजिन्ना साहब मुस्लिम लीगी, आज़ादी के इक नायक थे
अंग्रेजी शासन के खिलाफ, इंसान सही माने में थेब्रिटिश कूटनीति के फंदे में, स्वयं जिन्ना साहब फंस बैठे
मजहब धर्म की आंधी में, दो देश समर्थक बन बैठेहिन्दू मुस्लिम में आग लगी, बन गये खून के प्यासे थे
जो कल तक भाई होते थे, बन गये आज दुश्मन पक्केहर साल रंग की होली थी, इस साल खून से हम खेले
हर साल प्यार की खुशबू थी, इस साल घृणा के मेले थेआज़ादी की या सत्ता की, नेताओं में जो जल्दी थी
ब्रिटिश कूटनीति के फंदे में, फंसने की उनको जल्दी थीसब शर्त मान अंग्रजों का, आज़ादी हमने हासिल की
जो भूमि गुलामी में जुड़ी रही, वह आज़ादी में टूट गयीसैंतालिस का पन्द्रह अगस्त, खुशियों का सागर लाया
एक तरफ हजारों जीवन में, दुःख का मातम छायालाखों हज़ार घर उजड़ गये, चहुँ ओर भीड़ थी दुखियों की
जन जन के प्रिय गाँधी के लिए, वह समय नहीं था खुशियों कीजिन आदर्शो के खातिर, जीवन भर संग्राम किया
दब गये घृणा आंसू नीचे, सब बापू का अरमान मिटा -

देश मेरा स्वर्ग भूमि है
देश मेरा स्वर्ग भूमि है,
अमृत जिस देश का पानी है।
जहाँ का हर बच्चा भगत सिंह,
हर बहनें झाँसी की रानी है।
आर्य जहाँ के निवासी है,
गौरवपूर्ण जिसकी कहानी है।
जहाँ का हर पिता ईश्वरतुल्य,
और हर माता माँ भवानी है।
क्षमाशीलता जिसकी उर है,
संस्कृति जिसकी पाणि है।
जहाँ के हर युवक में जोश है,
और बूढे में भी जवानी है।
सुख की दरिया जहाँ बहती है,
जहाँ न किसी को क्लेश है।
इतनी भोली जनता जहाँ के,
पत्थर में भी देखती गणेश है।
जहाँ के धर्मों में विभिन्नता है,
पर गंतव्य सभी का एक है।
कितनी पावन धरा है वह,
जहाँ जन्म लिया “अभिषेक” है।
–अभिषेक कुमार “आर्य” -
जय हिन्द का नारा
जय हिन्द का नारा फिर बुलंद करो
टूटे आत्मसम्मान को फिर एक-सार करो
चित की चेतना को फिर चिंतित करो
आँखों के पानी को फिर लहु मै परिवर्तित करो
अधरों की चुप्पी को फिर बाधित करो
जय हिन्द का नारा फिर से बुलन्द करो
भारत को इन हुक्कमो से फिर मुक्त करो
भारत को नारी के सम्मान से फिर शुशुभित करो
भारत को भारत वासीयो की एकता से एक करो
उठो-२ ऐ देश भक्तो अपने जीवन को सफल करो ! -
कश्मीरियत ! इन्सानियत !!
गलतियाँ तुमसे भी हुई है , गुनाह हमने भी किये है
पत्थर तुमने फेंके , गोलियों के जख्म हमने भी दिए है ।
गोली से मरे या शहीद हुए पत्थर से; नसले-आदम का खून है आखिर ,
किसी का सुहाग ,किसी की राखी; किसी की छाती का सुकून है आखिर ।
कुछ पहल तो करो , हम दौड़े आने को तैयार बैठे है
पत्थर की फूल उठाओ , हम बंदूके छोड़े आने को तैयार बैठे है ।
बंद करो नफ़रत की खेती , स्वर्ग को स्वर्ग ही रहने दो
बहुत बोल चुके अलगाववाद के ठेकेदार ,अब कश्मीरियत को कुछ कहने दो ।
उतारो जिहाद , अलगाववाद का चश्मा
कि “शैख़ फैज़ल” और बुरहान वानियो में फर्क दिखे
दफन करदो इन बरगलाते जहरीले चेहरों को इंसानियत के नाम पर
कि आने वाली नस्लों की कहानियों में फर्क दिखे ।।
#suthars’
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pride of ‘tiranga’
There was a time
Totally Different form today
Where people were slaves
made to work all day
It was 69 years ago
They got out of this nightmare
Carrying the tricoloured flag
Freedom they declared
And even today we carry
The tricoloured flag
But why is it found next day
In the garbage bag?
The leaders those fighters
Who risked their lives
Was is just for a day?
Is this how we repay sacrifice
Maybe this is the time
We all must understand
It was not to get a day off
But with pride to stand
Let’s take a few moment
Praying for all fighters
Even their dead bodies won’t leave
They held ‘tiranga’ such tighter
The sacrifice of all fighter
And freedom that they found
Our ‘tiranga’ has it all
So never let it touch the ground.
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आजादी
स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाये।
गुलामी में भी हमारे दिल में देश की शान काफी थी,
तोड़ देते थे होंसला अंग्रेजो का हममे जान काफी थी,
पहनते थे कुर्ता और पाजामा खादी की पहचान काफी थी,
गांधी जी के मजबूत इरादों की मुस्कान काफी थी,
आजाद भारत देश को स्वतंत्र भाषा विचार को,
लड़ कर मर मिट जाने की तैयार फ़ौज काफी थी,
गुलामी की जंजीरों से जकड़े रहे हर वीर में,
स्वतंत्र भारत माँ को देखने की तस्वीर काफी थी॥
राही (अंजाना)
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मेरे भारत का झंडा तब बिन शोकसभा झुक जाता है
देख तिरंगे की लाचारी
कैसे हर्शाएं हम
आजादी पर कैसे नांचे
कैसे झूमे गायें हम
भारत माँ का झंडा जब
पैरों के नीचे आता है
और जहाँ अफ्जालों पर
मार्च निकाला जाता है
जिस देश में दीन-हीन कोई
पत्ते चाटकर सोता है
भूख की खातिर कोई यहाँ
जब बच्चे बेच कर रोता है
जहाँ अमीरों के हाथो से
बेटिया नोची जाती हैं
जब कोई सांसद संसद में
महिला को गाली दे जाता है
मेरे भारत का झंडा तब
बिन शोकसभा झुक जाता है
इस झंडे को किस तरह
दूर तलक फहराएं हम
विजय पताका कैसे कह दे
कैसे दुनिया पर छायें हम
आजादी पर गर्व हमें भी
पर ये कैसी आजादी है
जे एन यु में भारत माँ के
विरुद्ध नारे लगवाती है
भारत की एकता तब
खंडित खंडित हो जाती है
जब लालचोक पर झंडा फेहराने
को पाबन्दी हो जाती है
फिर आजादी पर कैसे नांचे
कैसे झूमे गायें हम
देख तिरंगे की लाचारी
कैसे हर्शायें हम
जब नेता गरीबी के बदले
गरीब हटाने लग जातें हैं
बी पी एल से सामान्य के
कार्ड बनाने लग जाते हैं
पकवानों के चक्कर में
रोटी महंगी हो जाती हैं
सड़कों पर अस्मत लुटती है
पर कोई शोर नही होता
किसानो की आत्महत्या पर
जब राजभवन में कोई नहीं रोता
भारत माता चुपके-चुपके
तब अपने आंसू बहाती है
इन आंसुओ की कीमत जानो
जनता का उद्धार करो
ख़ामोशी खल जाएगी हमको
देशद्रोहियों पर पलटवार करो
जो भारत माता को
नोचकर खाने वाले हैं
जो बेटियों की इज्जत पर
हाथ लगाने वाले है
इस आजादी की वर्षगांठ पर
ऐसे हाथ काट कर फेंको तुम
जो जय भारत न बोले
उसकी जीभ उखाड़कर फेंको तुम
करो स्थापना शांति की
और संस्कार भी गढ़ दो तुम
तभी आजादी के गीतों से
गुंजायमान ये धरती होगी
नहीं तो वो दिन दूर नहीं
जब फिर नई क्रांति होगी
नया सवेरा है, नए है दिन
नए नियम बनाओ तुम
इस धरती पर जन्म लिया
तो देशभक्त बन जाओ तुम
उसके बाद लाल किले पर
आजादी के गीत सुनाओ तुम!
© Puneet Sharma
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“भागीरथ जी प्रकट हो”
पाकिस्तान की औखात को देखकर ये भाव उठे, कोई गलती हो तो क्षमा करना —
जल जला उठा वो सैनिक, जिसमें जान बाकी है,
लहु से श्रंगार कर दुंगा, बस यही अहसान बाकी है,काफूर हो उठा हिमगिरी,यह जवां अविनाशी है,
महक उठा ये कश्मीर, खुश हो रहा काशी है,किसको क्या फांसी दी,तुम ये क्युँ बतलाते हो,
कईयों को मार दिया, क्युँ अब रूह जलाते हो,तुम क्या पाकिस्तानी गोदियों में पले-बढ़े हुए हो,
जो ऐक याकूबी मुर्दे पर सब के सब अड़े हुए हो,भारत की सरजमीं को, क्या दो गज में नाप लेगा,
बिछड़ी हुई विधवा के आंसू, क्या इनका बाप लेगा,खबरदार पाकिस्तान! , सोऐ हुए शेर को नहीं जगाते है,
शिकारी भले ही जिंदा हो या मुर्दा, नोच-नोचकर खाते हैं,तुम्हारी हर गोलियों का स्वागत,हम फूलों से करते हैं,
लेकिन तुम्हारे हर मुर्दे, मेरे तिरंगे कफन से डरते है,हमारा बस चले ,पाकिस्तान में ऐसा अलख जगाएंगे,
भागीरथ जी प्रकट हो, इनको गंगाजी में
नहलाऐंगे…:——– कपिल पालिया “sufi kapil “
(स्वरचित) -
मैं आर देख रहा था, मैं पार देख रहा था…
मैं आर देख रहा था, मैं पार देख रहा था,
बंद लतीफों की खड़े -खड़े मल्हार देख रहा था,
सोचा था तंग आकर लिखूंगा ये सब,मगर ये क्या,
कागज के टुकडों में दफन विचार देख रहा था,
मैं आर देख रहा था, मैं पार देख रहा था,पग भारी है उनके, जिनके किस्सों की भरमार देख रहा था,
मैं यहीं कहीं लड़की का चलता-फिरता बाजार देख रहा था,
कोशिश मत करो तुम सरकार-ए-आलम बात छुपाने की,
जब तुम्हारी ही कली को, बागों में शर्मसार देख रहा था,
मैं आर देख रहा था, मैं पार देख रहा था,मैं भारत की गरीबी पर, कुछ प्रचार देख रहा था,
नेताओं की फैलती महामारी का प्रसार देख रहा था,
सोचा था आज ही मेरा मेरा भारत नोटों में खैलेगा,
मगर वतन की जेब में छुपी कलदार देख रहा था,
मैं आर देख रहा था, मैं पार देख रहा था,भारत माँ की इस धरती पे खूनी त्योहार देख रहा था,
कश्मीर में फैला आतंकी पलटवार देख रहा था,
हे माँ! कैसे करूँ अब मांग तेरी पूरी तेरी जमीं पे,
मैं हर विधवा का खून भरा श्रंगार देख रहा था,
मैं आर देख रहा था, मैं पार देख रहा था
बंद लतीफों की खड़े-खड़े मल्हार देख रहा था,
मैं आर देख रहा था, मैं पार देख रहा था…………..—–:कपिल पालिया “sufi kapil “
(स्वरचित)
मो.न.— 8742068208, 7023340266 -
तिरंगा।
तिरंगा।
वस्त्र का टुकडा़नहीं, अस्मिता का मान है।
ये तिरंगा विश्व में निज गर्व की पहचान है।
केसरी ये रंग पराक्रम शौर्य है स्वाभिमान है।
श्वेत वर्णी शान्ति की ये साधना का ध्यान है।
ये हरित समृद्धि पट्टी ऐश्वर्य का परिधान है।
और चक्र नीला चौबीस घंटे कराता ज्ञान है।
दिलों से ऊंचा सदा ही स्थान इसको चाहिए।
ये सुरक्षा चादरीबाहों से न नीचा होना चाहिए।
नीचे न झुक जाए येे सूचक बने अपमान का।
शीश पर धारे फिरो ये मुकट है स्वाभिमान का
समृद्धि शाली देश की वैभव उगलती खान है।मां
मांभारती नस नस में रक्त बनकर दौड़ती रहे।
चिक्कार वीरों की सुन रिपु सांस तो थमती रहे।
इसकी रक्षा में छिपा हर भारतीय का कल्याण है।कपड़े का पट्टा नहीं, मुश्किल ही इसका बखान है।
सरोज दुबे (more…)
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तिरंगा
आजादी की शान तिरंगा।
तोड़ तिलस्म अंग्रेजों की ,
लेकर आया नवविहान तिरंगा।
शमां ए वतन की लौ पर कुर्बान तिरंगा ।
हर हिन्दूस्तानी की जान तिरंगा।
आजादी के इस पावन पर्व पर
आओ मिल कर सब गाए मेरी आन बान शान तिरंगा।
किशोर कुमार झा।
मुखर्जी नगर,
दिल्ली -110009
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जश्न-ए-आजादी में “इन भारतीयों” को न भूलना…
यहाँ जिस्म ढकने की जद्दोजहद में…
मरते हैं लाखों..कफ़न सीते सीते…
जरा गौर से उनके चेहरों को देखो…
हँसते हैं कैसे जहर पीते पीते…वो अपने हक से मुखातिब नहीं हैं…
नहीं बात ऐसी जरा भी नहीं है…
उन्हें ऐसे जीने की आदत पड़ी है…
यहाँ जिन्दगी सौ बरस जीते जीते…कल देश में हर जगह जश्न होगा…
वादे तुम्हारे समां बांध देंगे…
मगर मुफलिसों की बड़ी भीड़ कल भी…
खड़ी ही रहेगी तपन सहते सहते…-सोनित
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वो हिन्द का सपूत है..
लहू लुहान जिस्म रक्त आँख में चड़ा हुआ..
गिरा मगर झुका नहीं..पकड़ ध्वजा खड़ा हुआ..
वो सिंह सा दहाड़ता.. वो पर्वतें उखाड़ता..
जो बढ़ रहा है देख तू वो हिन्द का सपूत है..वो दुश्मनों पे टूटता है देख काल की तरह..
ज्यों धरा पे फूटता घटा विशाल की तरह..
स्वन्त्रता के यज्ञ में वो आहुति चढ़ा हुआ..
जो जल रहा है देख तू वो हिन्द का सपूत है..वो सोचता है कीमतों में चाहे उसकी जान हो..
मुकुटमणि स्वतंत्रता माँ भारती की शान को..
वो विषभरा घड़ा उठा सामान नीलकंठ के..
जो पी रहा है देख तू वो हिन्द का सपूत है..-सोनित
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गाथा आजादी की
लहू के हरेक बूँद से लिखी हुई कहानी है I
मेरे हिन्द की आजादी की गाथा जरा निराली है IIविश्वास की नदियाँ यहा, निश्छल सा प्यार था कभी
रहते खुशी से सब यहा, न द्वेष लेशमात्र भी
कुछ धूर्त आ गए यहा, कपटी दोस्त की तरह
इस देश को बेच दिया, हृदय हीन गुलामो की तरह
कैद कर दिया हमें अपने ही परिवेश में
कुंठित हुआ है जन जन ,देखो आज इस तरह
जिस्म पे हुए हरेक जुल्म की निशानी है I
मेरे हिन्द की आजादी की गाथा जरा निराली है IIयत्न है मेरा यही, रहो स्वतंत्र तुम विहारती
इस तन को भी मिटा गए खातिर तेरे माँ भारती
कहीं जो फिर इस जिस्म में, रूह को सजानी हो
आरजू जो है जीने की, इस हिन्द में जगानी हो
कभी हो सके ये तो है सौभाग्य मेरा
कि फिर तेरे लिए वतन, कुर्बाँ मेरी जवानी हो
कलमो के नित रूदन से अंकित हुई कहानी है I
मेरे हिन्द की आजादी की गाथा जरा निराली है II -
कुर्बानी के दम पे मिली है आजादी
कुर्बानी के दम पे मिली है आजादी
•~•~•~•~•~•~•~•~•~•~•~•~•उनसे ज्यादा है किसी का कोई तो सम्मान बोलो
जिसके आगे झुक गया है सारा हिन्दूस्तान बोलो
मुक्ति के जो मार्ग पर निकले थे ले अरमान बोलो
आखरी वही साँस तक लड़ते हुये बलिदान बोलोमातृभूमि पर जो न्योछावर हो गये, वही प्राण थे
भारतमाता के राजदुलारे वही तो प्रिये संतान थे
जान की बाजी लगाकर काट बन्धन दासता के
बेड़ियों से मुक्त माँ को करने में ही हुये कुर्बान थेगोद सूनी माँ का कोई कर गया दीवाना था
प्रियतमा की माँग सूनी कर हुआ अफसाना था
मिट गया कोई बहन का भाई राजदुलारा था
माँ की रक्षा में पिता के जो आँखों का तारा थाउनकी कुर्बानी के दम पे हमको मिली आजादी है
सत्तर सालों से जिसका अब देश हुआ ये आदी है
आज भी आँखों में पानी है, लबों पे वही तराना है
सबसे अच्छा देश ये प्यारा, केसरिया वही बाना हैरंग बसन्ती चोला निकला मस्तानों का टोला था
देख दीवानों को तन-मन नहीं, सिंहासन भी डोला था
उखड़ गई अंग्रेजी हुकूमत, भागी फिरंगी सेना थी
बलिदानी हुंकार से जब भी हिन्द ने जग को तोला थाआज वही अवसर है जब कुर्बानी याद दिलाती है
बाहरी ही नहीं, घर के भी भीतर की आग जलाती है
भेद-भाव के खेल से गोरे हम पर राज किये थे कल
आज भी खतरा टुकड़े-टुकड़े करनेवालों की मँडराती हैअब न चुकेंगे दिलवाले, कुर्बानी न जाएगी निष्फल
ललकारा रक्त शहीदों का, देता अब भी वही है बल
जिस बल के आजाद, भगत सिंह, नेताजी दीवाने थे
खुदीराम, सुखदेव, राजगुरू बच्चा-बच्चा परवाने थेप्राणों की आहूति देकर क्रांति की ज्वाला सुलगाते थे
जिसमें क्रूरतम जल्लादों को भी जिंदा रोज जलाते थे
आज वही फिर बारी है लक्ष्मीबाई रणचण्डी बन जाओ
ललनाओं की देख दशा, रक्षा की करें गुहार बुलाते थेकहाँ हमारे कुँवर सिंह हैं, गंगा की धार बुलाती है ,
जो उड़ा गई दुश्मन की शीश अब वो तलवार बुलाती है
कितने वीर सतावन से सैंतालिस तक सब याद आते हैं
आजादी के इस महापर्व पर सबको शीश नवाते हैंहम श्रद्धा-‘प्रसून’ अर्पित कर दिल का वचनबद्ध हो जाते हैं
अंतिम साँसों तक भारतमाता की रक्षा का संकल्प उठाते हैं
जो भी इस पावन धरती का अब अपमान करे, मिट जाएगा
मरकर भी अब मातृभूमि पर पूर्वजों का गौरव, मान बढाते हैं©प्रमोद रंजन ‘प्रसून’
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तिरंगा
नहीं तिरंगा मात्र ध्वजा ये जय का उदघोष भी है
अमर शहीदों का प्रतीक बिस्मिल,भगत,बोस भी हैउत्साह रगों में भरता यह क़ुरबानी को तत्पर करता
हर देशभक्त हर राष्ट्रभक्त इस पर जीता इस पर मरताजिससे रंग चुराकर प्रकृति माता का श्रृंगार करे
मान बढ़ाता वीरों का ये नित उनका सत्कार करेधर्म क्रांति सद्भाव प्रेरणा का देता सन्देश हमें
प्राण न्योछवर करने का देता ये उद्देश्य तुम्हेंयह पटेल का साहस है और ये भगत की क़ुरबानी
स्वाभिमान राणा का इसमें है इसमें झांसीरानीयह अखण्ड भारत है अपना यह ही हल्दीघाटी है
यह वीरों की अमर ज्योति है यह उनकी परिपाटी हैयह घाटी की गूंज है घायल सेना की हुंकार है ये
बर्बादी के नारों के जीवन पर भी धिक्कार हैजीने का अधिकार है तो प्राणों की आहुति है ये
है स्वतन्त्र बंधन भक्ति का धर्मचक्र की गति है ये -
सारे जग से प्यारा तिरंगा शान हमारी है
तीन रंगों से बना हुआ पहचान हमारी है
सारे जग से प्यारा तिरंगा शान हमारी है
आन, बान, सम्मान का सूचक
राष्ट्रनिष्ठा और ज्ञान का सूचक
प्रतीक ये अपने संविधान का
है अपने अभिमान का सूचक
सारे जग में न्यारा तिरंगा आन हमारी है
सारे जग से प्यारा तिरंगा शान हमारी है
अमर शहीदों की अभिलाषा
ये हर भारतवासी की आशा
गर्वित कर देता हर मनु को
दूर करे हर मन की निराशा
सारे जग में हमारा तिरंगा जान हमारी है
सारे जग से प्यारा तिरंगा शान हमारी हैअभिवृत अक्षांश
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आजादी
लहू है बहता सड़कों में
आक्रोश है कुम्हलता गलियों में
लफ़्जों मे है क्यों नफ़रत का घर
आग है फैली क्यों फिजाओं मेंरंगो में है क्यों बारूद भरा
क्यों दीये अंधेरों में रोते है
क्यों अजाने आज चीख रही है
क्यों आज हम गोलियां बोते हैममतायें क्यों मायूस है आज
बचपन आज बिलख रहा है
आज क्यों जल रहे है घर
भविष्य भारत का सुलग रहा हैहै अपने को आजाद कहने वाले
जरा आंखे तो उठा, नजरें तो मिला
कौन सी आजादी, किसकी आजादी
नारे लगाने क़ी आजादी
या फिर झण्डें फ़हराने की आजादी
कवितायें लिखने की आजादी
या राम-रहीम से लड़ने की आजादी
यूं सड़्कों पर नारे लगाने वाले
अभागे मायूसों को गले लगा
महगीं कारों पर झण्डे फहराने वालों
किसी किसी का तन तो ढक
है आजादी, आजाद है हम
जरा गले तो मिल, आवाज तो मिला
है अपने को आजाद कहने वाले
जरा आंखे तो उठा, नजरें तो मिला -

कैसी है ये आजादी
थप थप की आवाज से अचानक मैं चोंक गया
इक मासूम सा बच्चा खड़ा था,
मेरी कार के बाहर
अपने कुछ तिरंगो के साथ
बेचना चाहता था शायद
कमाना चाहता था
कुछ पैसे अपनी मां के लिए
या फिर अपनी बहिन को राखी पर कुछ देने के लिएआजादी के मायने मैं जान नहीं पाता हूं
किसको है यहां आजादी?
कैसी है ये आजादी?
किसी की आजादी छीनने की आजादी?
या फिर किसी का शोषण करने की आजादी?
वो बच्चा, जिसे किसी स्कूल की परेड में भाग लेना था,
वही रोटी की खातिर
सड़क पर झंडे बेच रहा है
आजादी के लिए जान गवानें वालों का सपना
आज सरे आम रो रहा है
भारत का भविष्य बीच सड़क पर
सस्ती कीमतों में बिक रहा है -
हम सबका हिंदुस्तान
इस देश में अजीब किस्म की बात चल रही है,
हिन्दू , मुस्लिम ,सिख ,ईसाई कहने को है सब भाई-भाई
ख़ास तौर पर हिन्दू और मुस्लिमान
इस कविता में न कोई ऐसा नाम हैं जो हिन्दू या मुसलमान हैं , बल्कि एक हिंदुस्तान हैंसदियों लंबा इतिहास है ये , सारे देशों में ख़ास हैं ये
दुनिया कहती है क्या चीज़ हैं ये , गंगा , जमुना तहज़ीब है ये
ये देश शिवा,राणा का हैं ; यह देश महाराणा का हैंजय हो , अशोक , महावीर , विक्रमादित्य सम्राट की
यह बुद्ध , आदिशंकर नाथ कीयह पृथ्वीराज चौहान का हैं , हैदर , टीपू सुल्तान का हैं !
यही यशोधा ने कृष्णा को पाला हैं , यही का सुभाष मतवाला हैंयही झाँसी की रानी हैं , यही का भगतसिंह बलिदानी है
एक जोश , एक सेलाब हैं ये ; अब्दुल कलाम का ख्वाब हैं ये !ये देश रफी के गानो , ये देशः लाता के तालो का
ज़ख़ीर हुसैन के थापों का , किशोर कुमार के रागों कादुनिया को दी है सरगम की देन , यही का हमारा तान सैन!
सारे संसार के गीत हैं ये हमारा जगजीत है ये!
ये तुलसी और कालिदास; गीतों ग़ज़लों की मीठासयही हैं ग़ालिब की ग़ज़ल
यही है चलता किसान अपना हल
यही वो इतराता हुआ ताजमहलयह लाल किला , यह क़ुतुब मीनार ,
अजन्ता एलोरा की पुकारयही बेकहोफ रूहानी मस्ती हैं
यही का मोहिनुद्दीन चिश्ती हैं !भाई चारा आंदन हैं है यहाँ
हमारे प्यारे विवेकानंद हैं यहाँयह कपिल, सचिन, गावस्कर हैं
सानिया , अभिनव हैं यहाँ
उषा मिल्खा की दौड़ हैं यहाँयहा मीणा हैं , मधुबाला हैं;
नरगिस वैजंतीमाला हैंअमिताभ , और सलाम हैं यहा
शाहरुख़ और आमिर खान है यहायहा साधू संतो की भाषा हैं
संबंधित की परिभाषा हैंगाँधी का अमर विचार हैं ये
टैगोर ,तिलक का प्यार है येये भगवा और हरा भी है
रंगों से भरा भरा भी हैये भजन और कवाली हैं
यहा ईद और दिवाली हैरोज़ा,करवाचौथ , रमज़ान हैं ये
गीता और कुरान है ये
कर्त्तव्य और ईमान हैं ये
दोनों का हिंदुस्तान हैं ये हम सब का हिंदुस्तान हैं ये -

Bharat Maa Ke Teen Stambh
Bharat maa ke in stambhon ko shat shat mera pranam hai
Ek jawan ek kisaan aur ek vigyaan hai.
Bharat maa ke vagyaniko ka kya kehna….
Ye hai hamari matribhumi ka anmol gehna
Aaj inki hi badolat udta mangalyaan hai
America cheen aur japan bhi hairan hai
Bharat maa ke in stambhon ko shat shat mera pranam hai
Ek jawan ek kisaan aur ek vigyaan hai
Bharat maa ke veer jawano ka kya kehna
Balidani amar ye mahaan, maut hai inka gehna
Cheer de dushman ko jahan shamsheer ki tankaar hai
Mastako ke jhund lage hai, dushman mein hahakaar hai.
Bharat maa ke in stambhon ko shat shat mera pranam hai…
Ek jawan ek kisaan aur ek vigyaan hai
Bharat maa ke haldhar,bhumidhar kisaan ka kya kehna
Anndata ye hain hamare dharti hai inka gehna
Sona ugle meri dharti kalpvriksho ki aayi bahar hai
Motiyon si fasal khadi hai,Saavan sadabahar hai
Bharat maa ke in stambhon ko shat shat mera pranam hai
Ek jawan ek kisaan aur ek vigyaan hai
Bharat maa ke in dharmon ka kya kehna
Mandir, masjid girijaghar dharm hai inka gehna
Mandiro ki aarti se ras rachate radha shyam hai
Allah hu ki hukarein hai, pakeezah subah ki azan hai
Bharat maa ke in stambhon ko shat shat mera pranam hai
Ek jawan ek kisaan aur ek vigyaan hai
Aao aaj hum pran lein apni devbhumi ko swarg tulya banayenge
Swach bharat abhiyaan ko hum safal karke dikhayenge
Koi bacha bhukha na rahe koi nirbhaya yu na mare
Is arsh se us amber tak chahuh ore tiranga hi fehre
Bharat maa ke in stambhon ko shat shat mera pranam hai
Ek jawan ek kisaan aur ek vigyaan hai
Mamta
All rights Reserved
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मेरे भारत का झंडा तब बिन शोकसभा झुक जाता है
देख तिरंगे की लाचारी
कैसे हर्शाएं हम
आजादी पर कैसे नांचे
कैसे झूमे गायें हम
भारत माँ का झंडा जब
पैरों के नीचे आता है
और जहाँ अफ्जालों पर
मार्च निकाला जाता है
जिस देश में दीन-हीन कोई
पत्ते चाटकर सोता है
भूख की खातिर कोई यहाँ
जब बच्चे बेच कर रोता है
जहाँ अमीरों के हाथो से
बेटिया नोची जाती हैं
जब कोई सांसद संसद में
महिला को गाली दे जाता है
मेरे भारत का झंडा तब
बिन शोकसभा झुक जाता है
इस झंडे को किस तरह
दूर तलक फहराएं हम
विजय पताका कैसे कह दे
कैसे दुनिया पर छायें हम
आजादी पर गर्व हमें भी
पर ये कैसी आजादी है
जे एन यु में भारत माँ के
विरुद्ध नारे लगवाती है
भारत की एकता तब
खंडित खंडित हो जाती है
जब लालचोक पर झंडा फेहराने
को पाबन्दी हो जाती है
फिर आजादी पर कैसे नांचे
कैसे झूमे गायें हम
देख तिरंगे की लाचारी
कैसे हर्शायें हम
जब नेता गरीबी के बदले
गरीब हटाने लग जातें हैं
बी पी एल से सामान्य के
कार्ड बनाने लग जाते हैं
पकवानों के चक्कर में
रोटी महंगी हो जाती हैं
सड़कों पर अस्मत लुटती है
पर कोई शोर नही होता
किसानो की आत्महत्या पर
जब राजभवन में कोई नहीं रोता
भारत माता चुपके-चुपके
तब अपने आंसू बहाती है
इन आंसुओ की कीमत जानो
जनता का उद्धार करो
ख़ामोशी खल जाएगी हमको
देशद्रोहियों पर पलटवार करो
जो भारत माता को
नोचकर खाने वाले हैं
जो बेटियों की इज्जत पर
हाथ लगाने वाले है
इस आजादी की वर्षगांठ पर
ऐसे हाथ काट कर फेंको तुम
जो जय भारत न बोले
उसकी जीभ उखाड़कर फेंको तुम
करो स्थापना शांति की
और संस्कार भी गढ़ दो तुम
तभी आजादी के गीतों से
गुंजायमान ये धरती होगी
नहीं तो वो दिन दूर नहीं
जब फिर नई क्रांति होगी
नया सवेरा है, नए है दिन
नए नियम बनाओ तुम
इस धरती पर जन्म लिया
तो देशभक्त बन जाओ तुम
उसके बाद लाल किले पर
आजादी के गीत सुनाओ तुम!
© Puneet Sharma
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श्रद्धांजलि
गीत
आधार छंद-द्विगुणित चौपाई
कुल ३२ मात्राएँ , १६-१६ पर यति
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आओ तुमको ले चलूँ वहाँ, जिस जगह वीर इक सोया था ।
डोली थी सजी हुई लेकिन, वह आत्ममुग्ध सा खोया था ।आँखों में चमक अजब सी थी, जैसे पौरुष को जीता हो ।
था मगर उनींदा ज्यों सपनों, को हाला जैसा पीता हो ।
होंठों पर मुस्कानें लेटीं, खुद का सौभाग्य जताती थीं ।
उस वीर पुरुष की दिव्य कथा, सम्मान सहित बतलाती थीं ।
फलदार वृक्ष सौभाग्य पूर्ण, जीवन में उसने बोया था….
आओ तुमको………।।कहते हैं जय भारत सुनकर, वह दीवाना हो जाता था ।
सरहद की माटी का चन्दन, माथे पर सदा लगाता था ।
मदमस्त फिजाओं में केवल, उसकी ही चर्चा होती थी ।
सूरज की प्रथम किरण उसको, छूकर उदयाचल धोती थी ।
वह आज विदा होने को था, जन जन का अंतस रोया था….
आओ तुमको……..।।वह बेसुध सी अम्मा उसकी, ललना-ललना कह रोती थी ।
आँखों से बहती धार प्रबल, उसके पैरों को धोती थी ।
बेटे के भोले चेहरे को, वह चूम चूम दुलराती थी ।
छाती को पीट-पीट अम्मा, होकर बेसुध गिर जाती थी ।
बस वहीं जानती थी उसने, उस रोज वहाँ क्या खोया था…..
आओ तुमको……।।उस ओर बिलखती एक बहन, भाई को गले लगाती थी ।
कुछ कहती-रोती-चीख लगा, झट से अचेत हो जाती थी ।
“भैया इस राखी पर किसको, मैं अब राखी भिजवाऊँगी ।
किसके सीने से लिपट भला, अपने दुख-सुख बतलाऊँगी ।”
इस तरह बिलखती बहना ने, सारा संसार भिगोया था ….
आओ तुमको…….।।थी चीख उठी कुदरत देखा, करुणा की उन तस्वीरों को ।
बूढ़ा बापू उस ओर सहज, था तोड़ रहा जंजीरों को ।
कहता- “किसान का गौरव है, बेटे का यह बलिदान अमर ।
यों रोकर क्यों करते हो कम, तुम वीरों का सम्मान अमर ।
ये स्वप्न वहीं साकार हुआ , बेटे ने जिसे सँजोया था….”
आओ तुमको…..।।राहुल द्विवेदी ‘स्मित’
लखनऊ, उत्तर प्रदेश
७४९९७७६२४१ -

स्वतन्त्रता की कहानी
गुलामी में भी हमारे दिल में देश की शान काफी थी,
तोड़ देते थे होंसला अंग्रेजो का हममे जान काफी थी,
पहनते थे कुर्ता और पाजामा खादी की पहचान काफी थी,
गांधी जी के मजबूत इरादों की मुस्कान काफी थी,
आजाद भारत देश को स्वतंत्र भाषा विचार को,
लड़ कर मर मिट जाने की तैयार फ़ौज काफी थी,
गुलामी की जंजीरों से जकड़े रहे हर वीर में,
स्वतंत्र भारत माँ को देखने की तस्वीर काफी थी॥
राही (अंजाना)
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पत्र
ये लहू कह रहा है कि भूल न जाना,
न हम कर सके जो वो करके दिखाना,
हम मिटे सरहदो पे कोई गम हमें नहीं
इस हिन्द की आजादी का , न कोई मोल तुम लगानाकण कण समेट हम धरा से,एक अडिग शैल बन जाएंगे
तुम छू सको हर कोर को, एेसा स्वतंत्र नभ दे जाएंगे
कभी शूल जो बिखरे हुए हो मुश्किलों के वतन पे,
इस देह में उनको समा, कहीं तिरंगे में लिपट जाएंगे Iप्रेम का विश्वास का नित दीप तुम जलाना,
मेरे हिन्द को विकास के पथ पर तुम चलाना,
ये कर्तव्य है तेरा सदा सुनो ए नौजवाँ,
पग पग हर एक मोड़ पर तुम इसको निभाना I -
सच में मिली आजादी?
हिन्द के निवासियों
धरती माँ पुकारती है
उठ खड़े हो जाओ तुम
माँ भारती पुकारती है
धर्म, जाती-पाती से तुम
बाहर आकर भी देख लो
आजाद भारत में आज भी
मजदूर बंधुआ बने देख लो
ये आजादी है या भ्रमजाल
वक्त चल रहा ये कैसी चाल
भूख की खातिर जहाँ
जिस्म बिकते देख लो
शौक की खातिर जहाँ
जिस्म नुचते देख लो
मानव की औकात क्या
पशु असुरक्षित हैं, देख लो
भारत के कर्णधारों से
भविष्य के सितारों से
माँ भारती ये पूछती है
सच में मिली आजादी है?
या फिर से कोई सजा दी है?
सच में आजादी गर चाहते हो
मत बटने दो देश को
धर्म-जाती के नाम पर
और अस्मिता की रक्षा करो
अपनी जान पर खेल कर
सुरक्षित स्त्री-पुरुष हों,
भरपेट भोजन गरीब को
छत बेघर को मिले,
आसरा अनाथ को
जिस दिन यह हो जायेगा
माँ भारती का बच्चा बच्चा
आजादी वाले गीत गायेगा
ऐसा हुआ नहीं कभी तो
आजादी का दिन मात्र एक
झंडा फहराने का त्यौहार
बन कर ही रह जायेगा.
-
फ़िर बतलाओ जश्न मनाऊँ मैं कैसी आजादी का
आतंकी की महिमा मंडित
मंदिर और शिवाले खंडित
पशु प्रेमी की होड़ है फ़िर भी
बोटी चाट रहे हैं पंडित
भ्रष्टों को मिलती है गोदी
देशभक्त होते हैं दंडित
सत्ता का हर इक दलाल बन बैठा ससुर जिहादी का
फ़िर बतलाओ जश्न मनाऊँ मैं कैसी आजादी का
ईद खून का खेल हो गयी
हत्या रेलमपेल हो गयी
होली और दिवाली पर
हावी बढ़ती विषबेल हो गयी
दोषी घूम रहे हैं बाहर
निर्दोषों को जेल हो गयी
जुल्म ढह रहा है सब पर ही खास वर्ग आबादी का
फ़िर बतलाओ जश्न मनाऊँ ————————–
नैतिकता का पतन हो रहा
जिससे घायल वतन हो रहा
और सियासत के दल्लों का
उद्दंडी से जतन हो रहा
कंस वंश की करतूतों पर
मोहित मोहन मदन हो रहा
विद्यालय में शंखनाद है भारत की बरबादी का
फ़िर बतलाओ जश्न मनाऊँ ———————
फूहड़ता सब पर है भारी
चाहे नर हो या हो नारी
स्नेह सनातन का भूले हैं
पश्चिम प्रीत हुई अति प्यारी
बच्चे बूढे हवस में डूबे
सबकी टपक रही है लारी
नंग धड़ंग बदन उर मन है अनुगामी उन्मादी का
फ़िर बतलाओ जश्न मनाऊँ ———————–
आरक्षण पर होते दंगे
अफसर भी बनते भिख्मंगे
सहनशीलता नहीँ किसी में
बात-बात पर होते पंगे
ऊँची शान, नाक वाले भी
देखो नाच रहे हैं नंगे
खुला समर्थन यहाँ हो रहा है अलगाववादी का
फ़िर बतलाओ के जश्न मनाऊँ ——————
प्याज टमाटर जब हों महँगे
ख़बरंडी के उठते लंहगे
किसको फिक्र सर्वहारा की
सबने दिखा दिये हैं ठहगे
सस्ते सूखे की सौदा में
मरता तो सब करते घैघै
स्वर्णउगाहक भोग करे नौकरशाहों की लादी का
फ़िर बतलाओ जश्न मनाऊँ ———————–
अँग्रेजी कानून चल रहे
आस्तीन में साँप पल रहे
नेहरू एडविना के अब तक
भारत माँ को पाप खल रहे
इशरत मेनन अफजल और
बटाला पर सब आँख मल रहे
संसद में बैठे आतंकी पहन के चोला खादी का
फ़िर बतलाओ जश्न मनाऊँ ———————–
जो बनकर चट्टान खड़ा है
सरहद सीना तान अड़ा है
जिसको जाति धर्म ना कोई
मातृभूमि का मान बड़ा है
दोष आज दुष्कर्मों का
उसके सर इक शैतान मढा है
दर्द मिला है उसको कितना शब्दों की आजादी का
फ़िर बतलाओ जश्न मनाऊँ ——————–
कवि देवेन्द्र प्रताप सिंह “आग”
9675426080
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क्रांतियुवा
खल्क ये खुदगर्ज़ होती।
आरही नज़र मुझे।।
इंकलाब आयेगा ना अब।
ये डर सताता अक्सर मुझे।।अशफ़ाक़ की,बिस्मिल की बातें।
याद कब तक आएँगी।।
शायद जब चेहरे पे तेरे।
झुर्रियां पड़ जाएँगी।।क्या भूल गए हो उस भगत को।
जान जिसने लुटाई थी।।
तेईस में कर तन निछावर।
दीवानगी दिखाई थी।।वीरता के रास्तों से
आज़ादी घर पर आई थी।
बेड़ियों के निशां थे सर पर
और खून में नहाईं थी।।आज सूरज वीरता का।
बादलों में गुम है।।
आधुनिक समय का युवा निक्कट्ठु।
निहायती मासूम है।।इंक़लाबी बन चुकी है।
एक लद इतिहास का।।
जुगाड़ ही सर्वोपरि है।
सत्य यही है आज का।।आसमा से क्रांतिकारी।
झांकते होंगे यहाँ।।
देखते होंगे के मुल्क हमरा।
आज तक पहुंचा कहाँ।।देखते के हर कोई।
राजनीति कर रहा।।
देश पे कोई क्या मरेगा।
अब देश अपना मर रहा।।आज़ाद सा कोई नहीं है।
सब भ्रष्टाचार में लिप्त हैं।।
सुखदेव जैसे युवा तो यहां।
चूर नशे में,विक्षिप्त हैं।।आज़ाद सारे भारतीय।
मज़हबों में कैद हैं।।
दूसरों से क्या लड़ेंगे।
आपस में धोखे-फरेब हैं।।माँ भारती के बाशिंदों सुन लो।
ये देश ही एक धर्म है।।उत्थान करना है इसी का।
सर्वोपरि यह कर्म है।।
हिंदू-मुस्लिम,सिख-ईसाई।
सब राष्ट्र की बिसात हैं।।
ये जो आज़ादी मिली है।
ये क्रांति की सौगात है।।क्रांतिकारी वीर सारे।
लड़ गए और मर गए।।
देश को गौरव दिलाकर।
स्वयं फांसी चड़ गए।।
बन सको तो बनो ऐसा।
के साथ में हो हिम्मतें।।
लड़ाई अपनी खुद लड़ो।
ना करो अब मिन्नतें।।
क्रांतिवीर ना सही।
सबल,प्रबल बन जाओ तुम।।
ढूँढो भीतर के भगत को।
युवा असल बन जाओ तुम।।
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स्वतंत्रता दिवस
पंद्रह अगस्त का पावन दिन , वीरों की याद दिलाता है |
शहीद हुए जो देश के खातिर , उनकी कथा सुनाता है |
तेरह वर्ष की उम्र में आकर , चौदह कोड़े थे खाये |
भारत माँ के लिए लड़े और , आजाद चन्द्र शेखर कहलाये |
गांधी ,सुभाष, बिस्मिल, रोशन ने , देश के खातिर प्राण दिये |
भारत की आजादी के हित , सारे सुख थे त्याग दिये |
लाल ,बाल और पाल ने मिलकर , आजादी का बिगुल बजाया |
लक्ष्मी, तात्या तोपें ने था , विद्रोह का स्वर गरमाया |
पूरब से लेकर पश्चिम तक , उत्तर से लेकर दक्खिन तक |
हर बच्चे के मन भभक उठी , आजादी की ज्वाला धधक उठी |
फिर भारत माँ की लाज बचाने , भारत का हर बच्चा आया |
लड़ता रहा साँस थी जब तक , दुश्मन को था मजा चखाया |
अरि के चंगुल से हमने तब , भारत को आजाद कराया |
लाल किले के ऊपर हमने , यह भव्य तिरंगा लहराया |
भारत के हर प्राणी को , आज कसम यह खाना है |
पंकज प्राण भले ही जायँ, पर झंडे को लहराना है |
आदेश कुमार पंकज -

पत्र
ये लहू कह रहा है कि भूल न जाना,
न हम कर सके जो वो करके दिखाना,
हम मिटे सरहदो, पे कोई गम हमें नहीं
इस हिन्द की आजादी का , न कोई मोल तुम लगाना Iकण कण समेट हम धरा से,एक अडिग शैल बन जाएंगे
तुम छू सको हर कोर को, एेसा स्वतंत्र नभ दे जाएंगे
कभी शूल जो बिखरे हुए हो मुश्किलों के वतन पे,
इस देह में उनको समा, कहीं तिरंगे में लिपट जाएंगे Iप्रेम का विश्वास का नित दीप तुम जलाना,
मेरे हिन्द को विकास के पथ पर तुम चलाना,
ये कर्तव्य है तेरा सदा सुनो ए नौजवाँ,
पग पग हर एक मोड़ पर तुम इसको निभाना I -
Kaisa hoga apna Hindustan….!!
Suno–sunaai degi tumhe–
Bharat maa ki chittkaar
Lahoo bahe– jo mere beto ke
Kyu hota ja rahaa bekaar…??
Shahaadat mere laal ki
Chup pattharro mei simat gyi hai
Mujhpar mar mitna mere bachcho ka–
Kyu sirf kahaani bankar rah gyi hai.??
Kya sochkar wey hue the qurban
Ki-Aisa ho jayega apna Hindustan…..???Raajneeti ki bayaare—-
Dishaaheen bahaa karengi…?
Har kisi ki zubaan —–
Jo chaahe kahaa karengi….?
Kyu mere bete aaj ke
Bhool gye hain farz aur Imaan
To kaho- kaisa hoga apna Hindustan…???Ghooos aur bhrashtachaar
Qanoon ka manmaanaa vyavhaar
Kartavya saare bhool rahe hain
Yaad sirf adhikaar aur adhikaar
Ghatne lagaa hai abb–
Bare-buzurgo ka maan-samman
To kaho-kaisa hoga apna Hindustan…??Sarkaari laabho ki jhappat
Garib bechare rahte bhatak-bhatak
Pheeke ho jaate unke arrmaan
To kaho-kaisa hoga apna Hindustan…..??Ro rahi unki qurbaniyaa
Kahaa khatm ho gyi wo baichainiyaa..?
Wo tarrap—– wo junoon
Ki, baato-baato mein
Desh ke naam pr-ubal parrte the khoon
Aaj zaroorat hai sirf——
Sudhar jaaye logo ki maansiktaa aur Imaan
Phir kaho–kaisaa hogaa apnaa Hindustaan….!!!
Kaisaa hogaa apnaa Hindustan….———Ranjit Tiwari “Munna”
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गीतिका
जीवन तो है आना जाना।
अपने फर्ज कभी न भुलाना।
अपने वतन पर मिटेंगे हम
कभी न कदम पीछे हटाना।
जो जां काम न आए वतन पर
कैसे मां रा कर्ज चुकाना।
आओ कदम बड़ाएं मिलकर
देश को यूं आगे बड़ाना।
तिरंगा घर घर लहराएगा
दुश्मन का न तुम खौफ खाना।।।
कामनी गुप्ता *** -
जिंदगी की चाहत
जहाँ हमें मिलना था वहीं मिलते
तो अच्छा था
जहाँ दूरियां न होती नजदीकीयां होती
वहीं मिलते तो अच्छा था
जहाँ फूल खिलते बहारें होती वहीं मिलते
तो अच्छा था
जहाँ सपने न होते हकीकत होती वही मिलते
तो अच्छा था
जहाँ वादे न होते भरोसा होता वही मिलते
तो अच्छा था
जहाँ दुशमनी न होती दोस्ती होती वहीं मिलते
तो आच्छा था
जहाँ वतन होता हिन्दुस्तान होता वहीं होते
तो अच्छा था
जहाँ वंदेमातरम् होता जहाँ राष्ट्रीय गान होता वहीं होते
तो अच्छा था ।जयहिंद – रीता अरोरा
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आजादी
आजाद हैं हम या अफवाह है फैली चारों ओर आजादी की,
जंज़ीरों में बंधी है आजादी या बेगुनाही में सज़ा मिली है आजादी की,
हकीकत है भी हमारे देश की आजादी की,
या बस गुमराह ख्वाबो की बात है आजादी की,
दिन रात सरहद पर डटे हैं फौजी घाटी की,
सो खाई थी कसम ज़ंज़ीर तोड़ देंगे गुलाम आजादी की॥
राही (अंजाना) -
स्वतंत्रता दिवस
हो गए आज़ाद मगर क्या खोया क्या पाया है।
आज़ादी के पंखों पर आतंक का गहरा साया है।
शहीदों को श्रद्धांजलि सच्ची होगी यही अब के,
कम न होने देंगे आन,शान अपना यही सरमाया है।
जागो खुद भी नव चेतना ऐसी जगाओ तुम,
आपस में लड़ कर हर किसी ने खुद का घर जलाया है।
एक हैं हम एक रहेंगे यह नारा भी लगाना है,
लहु वीरों का बहते देख दिल अपना भर आया है।
न हो जाया कुर्बानी अब वतन के शहीदों की,
घर घर तिरंगा लहराएगा बच्चा बच्चा दोहराया है।।।
कामनी गुप्ता *** -
तेरी सुबह बङी निराली है
तेरी सुबह बङी निराली है..
तेरी शाम मधुर सुहानी हैं..
एे जानो जिगर से प्यारे वतन..
तेरे वैभव की अमर कहानी हैं
वन्दे मातरम् वन्दे मातरम् वन्दे मातरम्
है चरण पखावत सिंधु तेरे
मस्तक पर सजा हिमाला हैं
है पुरब लालिमा सूरज की
और पश्चिम उदय उजाला हैं
है हरी वसुन्धरा सुख दायी..
तेरे वीरों की अमर कहानी हैं
ऐ जानो जिगर से प्यारे वतन
तेरे वैभव की अमर कहानी हैं
वन्दे मातरम् वन्दे मातरम् वन्दे मातरम्
है बाईबिल गीता गुरूबाणी
और पाक बखान कुराण हैं
है गीत ग्यान की गंगा बहे
और ध्यान में वेद औ पुराण है
है सिख मुसलमांन बुद्ध यहां
हर हिन्दु की अमर जवानी हैं
ऐ जानो जिगर से प्यारे वतन
तेरे वैभव की अमर कहानी हैं
वन्दे मातरम् वन्दे मातरम् वन्दे मातरम्
सब जान न्यौछावर करते हैं
तेरे सन्मान में तत्पर रहते हैं
हर भाषा भाषी मिल कर के
तेरी महिमा मंगल गाते हैं
तेरे मन्दिर मस्जिद गिरजे हैं
और गली गली में अजान हैं
ऐ जानो जिगर से प्यारे वतन
तेरे वैभव की अमर कहानी हैं
वन्दे मातरम् वन्दे मातरम् वन्दे मातरम्
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नन्द सारस्वत बैंगलुरू
8880602860
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Aazaadi……..!
Aazaadi ki keemat hamne bahut badi chukaai hai
Tab jaa kar hamne ye aazaadi paai haiYe din hai bahut sunhaira, ye din hai bahut pavitra
hindustaan ko aazaad rakhne ki ham sab ne kasam khaai haiAazaadi ki keemat hamne bahut badi chukaai hai
Tab jaa kar hamne ye aazaadi paai haideshbakhton ne sinchaa hai esko apne khoon se
aur bharat maa per apni jaan lutaai haiAazaadi ki keemat hamne bahut badi chukaai hai
Tab jaa kar hamne ye aazaadi paai haiHar yaad es din ki taza hui aaj phir,
Har gali, har nukkad per yahi goonch paai haiAazaadi ki keemat hamne bahut badi chukaai hai
Tab jaa kar hamne ye aazaadi paai haiHaste haste suuli chadh gaye bhagat singh
Chandra sekhar ne khusi khusi prano ki bainth chadhai haiAazaadi ki keemat hamne bahut badi chukaai hai
Tab jaa kar hamne ye aazaadi paai haiRakhenge ham apne desh ko aazaad hamesha
Har hindustaani ne aaj yahi kasam khaai haiAazaadi ki keemat hamne bahut badi chukaai hai
Tab jaa kar hamne ye aazaadi paai haiMahatma gandhi ki wo dhandi yatra,
Aur jaliawala bhag ki kahani aaj yaad aai haiAazaadi ki keemat hamne bahut badi chukaai hai
Tab jaa kar hamne ye aazaadi paai haiAao aaj sab mil kar naman kare
Un sapooton ko jinhone hame ye aazaadi dilaai haiAazaadi ki keemat hamne bahut badi chukaai hai
Tab jaa kar hamne ye aazaadi paai haiBaikaar nahi jaane denge ham unki kurbaani ko
aaj ham sab ne yahi kasam khaai haiAazaadi ki keemat hamne bahut badi chukaai hai
Tab jaa kar hamne ye aazaadi paai haiBahut kuch khooya hai sab ne
Bahut kuch kaiyon ne aazaadi ke khaatir gawai haiAazaadi ki keemat hamne bahut badi chukaai hai
Tab jaa kar hamne ye aazaadi paai haiSat sat naman un desh bhakton ko
Jinhone ham sab ko ye nai subaah dikhaai haiAazaadi ki keemat hamne bahut badi chukaai hai
Tab jaa kar hamne ye aazaadi paai hai …………………….!!!!D K
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हिन्दुस्तान
जहाँ हिन्दू मिले जहाँ पर मुसलमान मिले उसे हिन्दूस्तान कहते हैं,
जहाँ हर मज़हब को एक सा सम्मान मिले उसे हिन्दूस्तान कहते हैं।कहदो उससे जाकर जहां में हमारे मुल्क से अच्छा कोई मुल्क नहीं,
जहाँ गुरुग्रंथ बाईबल गीता और कुरान मिले उसे हिन्दूस्तान कहते हैं।जिसने सदियों से संजोऐ रख्खा है इन मोतीयों को एकता के धागे में,
जहाँ आँगनों में तुलसी घरों में रहमान मिले उसे हिन्दूस्तान कहते हैं ।हमारा वतन हमको जान से प्यारा है यही बस हमारे जीने का सहारा है,
जहाँ मंदिरों में घंटीयाँ मस्जिदों में अजान मिले उसे हिन्दूस्तान कहते हैं ।हो जाएगी बेकार ये सब कोशिशें तुम्हारी हमको आपस में लड़वाने की,
जहाँ एक दूजे के लिए हथेलीयों पर जान मिले उसे हिन्दूस्तान कहते हैं ।आखिर क्यों ना हो ग़ुमान हमको खुद पर अपने हिन्दूस्तानी होने का,
जहाँ भाईचारा जहाँ अमन ओ अमान मिले उसे हिन्दूस्तान कहते हैं ।सिर्फ और सिर्फ वतन परस्ती यही हमारा धरम है यही हमारा करम है,
जहाँ दिलों की हर धड़कन में हिन्दूस्तान मिले उसे हिन्दूस्तान कहते है ।इस मिट्टी का दाना पानी बनके जिंदगी रगों में हमारी दौड़ रहा है
जहाँ हर क़तरा खून का अपने वतन पे कुर्बान मिले उसे हिन्दूस्तान कहते हैं । -
एकता की जोत
हम भारत मैं एकता की
अखंड जोत जलायेंगै
बहकावे में किसी के
अब न हम आयेंगे
दुख और मुश्किलों से
अब ना हम घबरायेंगे
रोटी एक हो या आधी
मिल बांटकर हम खायेंगे
अभी प्रेम हमारा
देखा है तुमने
जिस दिन रोष हमारा
देखोगे
खुदा भी बचा न पायेगा
खूनी दिन और खूनी रातें
कब तिलक खेल ये खेलोगे
जाग गया है हिन्दूस्तान
जाग गया है बच्चा – बच्चा
जाग गया हर नोजवान
दंगाईयों को मार – मारकर
देश से हम भाग देंगे
अब देश को यूँ ना हम
खूनी रंग से रंगने देंगे
यहाँ प्यार बसे हैं दिलों में
प्यार के रंग चढायेंगे
सबसे पहले भगवा रंग
फिर तिरंगा हम लहरायेंगेप्रस्तुति – रीता अरोरा
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????आजादी मुबारक हो????
????आजादी मुबारक हो????
????????????
तोते पिंजरे जैसी बोली, खूब बढ़ी आबादी है,
पंछी के पर काट दिए है, ये कैसी आजादी है।आजादी ये रूला रही है अब भी भूखे प्यासों को,
जाने क्यों ये भुला रही है अब भी भूखे प्यासों को,,आधी आबादी ये अब भी भूख-भूख चिल्लाती है,
तन से मन से खाली रहती सब को ही झल्लाती है,,हमने सूखी चिंगारी से, डरते कोई देखा है,
हमने एक निवाले खातिर, मरते कोई देखा है,,जन गण मन में बसने वाले, सपने अभी अधूरे है,
भारत सत्ता पाने वाले, अपने अभी अधूरे है,,दागी पाये राजमुकुट को, ये बर्बादी आई है,
चंद भिखमंगो के लिए ही ये आजादी आई है।दम्भी दम्भ भरते है किन्तु, कोई बोल न पाता है,
हिम्मत करके जो भी बोला, केवल मारा जाता है।आजादी तो सिर्फ मिली है, साजिश बुनने वालो को,
बिना खड्ग और बिना ढाल के गीत सुनने वालो को,भारत में भी उस दिन मानो, सच्चा शासन आयेगा,
जिस दिन सच्चा सैनिक कोई, भारत गद्दी पायेगा,,भूखे को रोटी जब देखो, घर- घर तक पहुँचाओगे,
मानो उस दिन भारत में तुम,सच्चा शासन लाओगे।
?????????
-मन्जीत सिंह अवतार —9259292641
www.facebook.com/DrManjeetsinghavtar -
स्वतंत्रता दिवस’ प्रतियोगिता सावन
कृपया राष्ट्र गान धुन में गायें
**********************तन मन धन न्योछावर कर दें
तुम पर भारत माताविज्ञान ज्ञान भंडार भरें सब
रखें सदा मन चंगाकरुणा दया प्रेम रस बरसे
नही हो देश में दंगाऔर न कुछ हम मांगें
बस यह आशिष मांगें
विश्व गाए जय गाथातन मन धन न्योछावर कर दें
तुम पर भारत मातावन्दे वन्दे वन्दे
जय भारत वन्देजय हिन्द।
- आनन्द प्रकाश अग्रोही
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कश्मीर जरुरी है
पितरों के तर्पण को जैसे, थाली में खीर जरुरी है,
भारत माँ के श्रृंगार को वैसे, ही कश्मीर जरुरी है|
चमकी थी जो सत्तावन में, अब वो तलवार जरुरी है,
प्यार मोह्हबत बहुत हो गया, अब तो वार जरुरी है |
खूब बहा लिया लहू सीमा पर, भारत माँ के लालों ने,
जागो नींद से देशवासियों अब, इक हुंकार जरुरी है|
भेद ना पाए दुश्मन सीमा को, ऐसी पतवार जरुरी है,
और देश के गद्दारों को अब, दुत्कार जरुरी है |
ऋषभ जैन “आदि”
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देशभक्ति
ये कविता मैने खुद को एक बार बचपन मे रख के,जवानी मे रख के और एक बार खुद को आखिरी सफर मे रह कर महसुस करते हुवे लिखा है,कि हमारे सैनिक भाई क्या सोचते है और ये गंदी सियासत क्या सोचती है, मै आशा करुंगा कि ये आपको पसंद आयेगी,
(देशभक्ति के सफ़र मे)
बन के बादल तीन रंगो मे निखर आउंगा,
एक न्नहा सा देशभक्त हो उभर आउंगा,इस छोटे बदन को वतन से प्रेम है,
इस न्नहे कलम को वतन से प्रेम है,
जिसे ओढ के मै फक्र से मर जाऊ,
तिरंगे सा हर एक कफ़न से प्रेम है,ऐसा नही कि मौत आने पे डर जाऊंगा,
बन के बादल•••••••••••••••••••••••घर के चौखट को अब लांघ के आया हु,
आसु माँ के आचल मे बाँध के आया हु,
ना दर्द है,न मोह है, न चाह है न शिकवा,
बस दुश्मन को निशाने पे साध के आया हुमौत के बाद शान से तिरंगे मे घर जाऊंगा
बन के बादल ••••••••••••••••••••••••••••••मौत सामने है फिर भी एक काम चाहता हु,
दोस्त फिर से पुराना हिन्दुस्तान चाहता हु,
ये सियासत ,ये भेदभाव सब भूल जाओ,
आखिरी सफ़र मे यही मुकाम चाहता हु,तिरंगे मे अपने रक्त से एक रंग भर जाऊंगा,
बन के बादल ••••••••••••••••••••••विशाल सिंह बागी
9935676685 -
श्रधांजलि
आवो !
हम सब नमन करें
भारत के वीर सपूतो का !
जिनने आज़ादी के हवन कुंड में
अपना सब कुछ होम दिया
आवो !
हम सब नमन करें
भारत के वीर शहीदों का !
जो नित्य बलिदान दे रहे
सीमा पर अपने प्राणों का !
आज़ादी की रक्षा खातिर
आवो उनकी आवाज़ सुने
पर्वतों के पार से
सीमा के हम पहरेदार
पड़े रहते
खुले मैदानों में
नंगी चट्टानों पर
बर्फ की सिल्लियों पर
या कभी
धूल रेत के
कोमल गद्दों पर
चाँद तारों की महफ़िल को
निहारते
साथ ही निहारते
पर्वतों के पार
सीमा के हम पहरेदार
झेलते
सर्द बर्फीली हवा को
धूल रेत की आंधी को
या कभी
नभ से हो रहे हिमपात को
मूक बने देखते
प्रकृति के व्यापार को
साथ ही निहारते
पर्वतों के पार
सीमा के हम पहरेदार
हड्डियो के जोड़ जोड़ काँप रहे
पोर पोर सिहर रहे देह के
या कभी
बर्फ के तूफ़ान में फँसे
कड़कड़ाती सर्दियों से जूझते
बर्फ को निहारते
साथ ही निहारते
पर्वतों के पार
सीमा के हम पहरेदार
रक्त लाल बर्फ बने
नैन नीर शून्य बने
या कभी
नैन ज्योति शून्य बने
हवा विहीन शून्य में निहारते
साथ ही निहारते
पर्वतों के पार
सीमा के हम पहरेदार
कट जाय हाथ मोह नहीं
कट जाय पैर मोह नहीं
या कभी
पुरुषत्व भी सदैव के लिए मिटे
देश अर्थ मिट रहे लुट रहे
स्वयं को निहारते
साथ ही निहारते
पर्वतों के पार
सीमा के हम पहरेदार
दुश्मनों को रोकने को
पत्थरें खड़ी हुई
गोलियों को रोकने को
छातियाँ अड़ी हुई
या कभी
दुश्मनों को चीरने को
आरियां खड़ी हुई
गोलियों से जूझते
देश को निहारते
साथ ही निहारते
पर्वतों के पार
सीमा के हम पहरेदार
-
“आखिरी जंग”
नत मस्तक
शीश झुकाए
कतारबद्ध खडा हूं मैं
लिए लघु हृदय
वीरों संग
दौड चला
घावो की परवाह
किए बिना
तत्पर हूं
कुछ करने को
इस देश के लिए
मरने को
बना लिया है
लक्ष्य अब
विजय पताका
लहराना बस
शीर्ष कारज
रहेगा अब