मज़बूरी

रूह काँप जाती थी सोचकर, बगैर तेरे रहना ।
आज ये आलम है, पड़ रहा गमे-जुदाई सहना ।

इसे वक्त की मार कहूँ, या मज़बूरी का नाम दूँ,
गलत ना होगा, इसे जिंदगी की जरूरत कहना ।

किस दोराहे पर वक्त ने ला खड़ा कर दिया ‘देव’,
कुछ वक्त ने, कुछ तुमने, सीखा दिया तन्हां जीना ।

देवेश साखरे ‘देव’


लगातार अपडेट रहने के लिए सावन से फ़ेसबुक, ट्विटर, इन्स्टाग्राम, पिन्टरेस्ट पर जुड़े| 

यदि आपको सावन पर किसी भी प्रकार की समस्या आती है तो हमें हमारे फ़ेसबुक पेज पर सूचित करें|

14 Comments

  1. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - December 8, 2019, 2:43 pm

    Nice

  2. Poonam singh - December 8, 2019, 3:36 pm

    Nice

  3. Abhishek kumar - December 8, 2019, 3:51 pm

    Nice

  4. Pragya Shukla - December 9, 2019, 8:43 pm

    Good

  5. Abhishek kumar - December 14, 2019, 5:43 pm

    सुन्दर रचना

  6. Abhishek kumar - December 21, 2019, 10:20 pm

    Good one

Leave a Reply