मन

मधुमालती छंदाधारित कविता – शीर्षक – मन
(कुल 14 मात्रा, विन्यास 2212, 2212)
*******************
मन फूल सा, कोमल न हो,
पर ठोस हो, तो बात है।
मन ही न हो, तब आदमी,
क्या आदमी, है खाक है।
मन न छोटा, कर ए मानव,
मन बड़ा रख, जोश में रह।
डूब मत यूँ, दर्द में तू,
त्याग निद्रा, होश में रह।
मन जरूरी, जिन्दगी को
मन नहीं तो, कुछ नहीं है।
कुछ करो तुम, काम लेकिन
मन नहीं तो, कुछ नहीं है।
तू जगा ले, यह ललक अब,
जिन्दगी है, रोशनी है,
रोशनी पा, खूब खुश रह,
अपनी मंजिल, खोजनी है।

Related Articles

दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-34

जो तुम चिर प्रतीक्षित  सहचर  मैं ये ज्ञात कराता हूँ, हर्ष  तुम्हे  होगा  निश्चय  ही प्रियकर  बात बताता हूँ। तुमसे  पहले तेरे शत्रु का शीश विच्छेदन कर धड़ से, कटे मुंड अर्पित करता…

प्यार अंधा होता है (Love Is Blind) सत्य पर आधारित Full Story

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥ Anu Mehta’s Dairy About me परिचय (Introduction) नमस्‍कार दोस्‍तो, मेरा नाम अनु मेहता है। मैं…

Responses

  1. “मन जरूरी, जिन्दगी को मन नहीं तो, कुछ नहीं है।कुछ करो तुम, काम लेकिन मन नहीं तो, कुछ नहीं है।” कवि सतीश जी का बहुत ही सुन्दर सन्देश है कि कोई भी काम करो तो में लगा के करो । बिना मन के तो किसी भी काम में मन ही नहीं लगेगा ।काम में मन लगा कर ही अपनी मंज़िल को पा सकेंगे . सुन्दर भाव एवम् सुन्दर प्रस्तुति .

New Report

Close