मधुमालती छंदाधारित कविता – शीर्षक – मन
(कुल 14 मात्रा, विन्यास 2212, 2212)
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मन फूल सा, कोमल न हो,
पर ठोस हो, तो बात है।
मन ही न हो, तब आदमी,
क्या आदमी, है खाक है।
मन न छोटा, कर ए मानव,
मन बड़ा रख, जोश में रह।
डूब मत यूँ, दर्द में तू,
त्याग निद्रा, होश में रह।
मन जरूरी, जिन्दगी को
मन नहीं तो, कुछ नहीं है।
कुछ करो तुम, काम लेकिन
मन नहीं तो, कुछ नहीं है।
तू जगा ले, यह ललक अब,
जिन्दगी है, रोशनी है,
रोशनी पा, खूब खुश रह,
अपनी मंजिल, खोजनी है।
मन
Comments
5 responses to “मन”
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वाह सर, मधुमालती छंद में बहुत सुंदर
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कमाल की कविता वाह
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क्या बात है
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अतिसुंदर
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“मन जरूरी, जिन्दगी को मन नहीं तो, कुछ नहीं है।कुछ करो तुम, काम लेकिन मन नहीं तो, कुछ नहीं है।” कवि सतीश जी का बहुत ही सुन्दर सन्देश है कि कोई भी काम करो तो में लगा के करो । बिना मन के तो किसी भी काम में मन ही नहीं लगेगा ।काम में मन लगा कर ही अपनी मंज़िल को पा सकेंगे . सुन्दर भाव एवम् सुन्दर प्रस्तुति .
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