“महबूब”

“महबूब”

शबनम से भीगे लब हैं, और सुर्खरू से रुख़सार;

आवाज़ में खनक और, बदन महका हुआ सा है!

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इक झूलती सी लट है, लब चूमने को बेताब;

पलकें झुकी हया से, और लहजा ख़फ़ा सा है!

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मासूमियत है आँखों में, गहराई भी, तूफ़ान भी;

ये भी इक समन्दर है, ज़रा ठहरा हुआ सा है!

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बेमिसाल सा हुस्न है, और अदाएँ हैं लाजवाब;

जैसे ख़्वाबों में कोई ‘अक्स’, उभरा हुआ सा है!

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जाने वालों ज़रा सम्हल के, उनके सामने जाना;

मेरे महबूब के चेहरे से, नक़ाब सरका हुआ सा है!!

ღღ__अक्स__ღღ

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1 Comment

  1. महेश गुप्ता जौनपुरी - September 9, 2019, 7:41 pm

    वाह बहुत सुंदर रचना

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