मेरे अल्फाज अब कहाँ रहें, ये तो तेरी मुहब्बत की जहागीर हुई ।

मेरे अल्फाज अब कहाँ रहें, ये तो तेरी मुहब्बत की जहागीर हुई ।
ये तो तेरे हुश्न-शबाब में खोया है, तेरी मुहब्बत में ये कुछ कहता है ।
ये मेरे अल्फाज़ रहे अब कहाँ, ये तो तेरी हुश्न की जहागीर हुई ।
तेरे दर्द को समझे तेरे हँसने पे ही कुछ कहें ये तो तेरी जहागीर हुई ।।1।।

मेरे अश्क अब बहते कहाँ ये तो सागर की लहरों में गुम हुई ।
ऊँची तरंगे, लहर-तुफानी, चक्रवात-बवंडर सी बनी जिन्दगानी हमारी ।
तुझसे मुहब्बत क्या हुई सारी दुनिया यूँ मुझसे नजर चुराने लगी ।
मेरे अल्फाज़ तेरी मुहब्बत की जहागीर हुई ।।2।।

अल्फाज़ बयां करते है सबकी ये अपनी-अपनी बात है ।
मगर ये दिल मेरा कोई अल्फाज नहीं तेरी मुहब्बत में ये तो सिर्फ तुझे चाहा है ।
कभी दिन में सुरज जो दिखते थे आज वो क्यूँ मातम में खोया है ?
मेरे अल्फाज़ तेरी मुहब्बत की अब तो जहागीर हुई ।।3।।
कवि विकास कुमार

Comments

4 responses to “मेरे अल्फाज अब कहाँ रहें, ये तो तेरी मुहब्बत की जहागीर हुई ।”

    1. धन्यवाद इंसान हूँ गलती तो हो हीजाती है ।। शुक्रिया ।.

  1. Satish Pandey

    गजब

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