मैं पानी का आईना हूं

टूटता हूं फिर से जुड जाता हूं
मैं पानी का आईना हूं

घर से लिये हूं रात का सूरज
कहने को मिट्टी का दीया हूं

गले गले है पानी लेकिन
धान की सूरत लहराता हूं

रस की सोत बनेगी दुश्मन
गन्ने सा चुप सोच रहा हूं

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5 Comments

  1. Mohit Sharma - November 12, 2015, 1:00 pm

    nice poem kapil bro

  2. Vikas Bhanti - November 12, 2015, 1:36 pm

    Kapil जी , इस कविता की हर लाइन में अपने होने और न होने को साकार किया गया है और जिस तरह से उसे आपने बिछाया है वो बेहतरीन है… I have become a fan of your magic of words… Amazing…

  3. राम नरेशपुरवाला - September 12, 2019, 12:47 pm

    Good

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