हाँ,, मैंने लोगो को बदलते देखा हैं!!

हाँ,, मैंने लोगो को खुद में ही बदलते देखा हैं!!
उनके जज्बाती हम को अहम बनते देखा हैं,
कल तक जो सबको साथ लेकर चलने की बात करते थे,,,
आज उनके खिलाफी ख्वाबो को भी अनाथ होते देखा हैं!!

गलत सोचता था कि नाराजगी,,
होती हैं चाँद लफ्जो की दगावाजी,,
उनके प्यारे सावन से मिलकर जाना,,
ये तो सुनामी की हैं कलाबाजी!!
मगर सुनामी से ही सागर को उझड़गते देखा हैं,,
हाँ,, मैंने लोगो को खुद में ही बदलते देखा हैं!!

तुझे भी दगा देना हैं तो शौक से दे दिल,,
हम तो साँसों से भी काम चला लेंगे,,
घुट घुट कर जी जाऊंगा मैं इतना कि,
सावित्री की याद यमराज को दिला देंगे!!
अधूरेपन से खुद को आबाद होते देखा हैं,,
हाँ,, मैंने लोगो को खुद में ही बदलते देखा हैं!!

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पेशे से इंजीनियर,,, दिल से राईटर

7 Comments

  1. पंकजोम " प्रेम " - December 4, 2015, 1:48 pm

    जो कभी झुकते नहीं थे , प्यार पाने सजदों मे उन्हें झुकते देखा है….
    हाँ , मैंने लोगोँ को ख़ुद में बदलते देखा हैँ…..

    Bht bdia lines hai , bhai …keep it up

  2. Anirudh sethi - December 4, 2015, 6:23 pm

    wah ji wah..kya kavita he..

  3. Mohit Sharma - December 4, 2015, 7:11 pm

    umeedo ko zindagi me jalte dekha he
    haan mene logo ko badalte dekha he 🙂

  4. Kapil Singh - December 4, 2015, 7:19 pm

    aankon me aks khinchti hui kavita likh di aapne…keep it up

  5. anupriya sharma - December 4, 2015, 9:30 pm

    carefully crafted poetry..nice

  6. अंकित तिवारी - December 7, 2015, 4:24 pm

    Thanks everyone

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