हैसियत क्या थी मेरी…

हैसियत क्या थी मेरी पूछिए मत,
बस किताब के कोरे पन्ने थे ,
लिखते रहे अपनी रूबानी,
जब बनी ना कोई गजल ना कोई नज़्म,
फटकर सिमटकर पैरों तले बस कुचले गए।


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14 Comments

  1. Vasundra singh - September 6, 2020, 6:49 pm

    बहुत खूब प्रतिमा जी

  2. Rishi Kumar - September 6, 2020, 6:55 pm

    Vah vah
    Bahut khub

  3. Geeta kumari - September 6, 2020, 7:05 pm

    वाह

  4. Anu Singla - September 6, 2020, 8:37 pm

    NICE

  5. मोहन सिंह मानुष - September 6, 2020, 10:27 pm

    कम शब्दों में बहुत गहराई वाले भाव
    बहुत ही लाजवाब

  6. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - September 7, 2020, 11:14 am

    बहुत खूब

  7. प्रतिमा चौधरी - September 13, 2020, 12:10 am

    bahut sundar….

  8. Deep Patel - September 23, 2020, 4:40 pm

    bahut sundar

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