ग़ज़ल

ये माना कि ; मैं तेरा ख्बाब नहीं हूँ ।
मगर फिर भी ; इतना ख़राब नहीं हूँ ।।

नशे–सा मैं; चढ़ता–उतरता नहीं ।
सुराही सब्र की हूँ ; शराब नहीं हूँ ।।

मुझे पता है कि ; तू ! भुला न पायेगी ।
सुलगता सवाल हूँ—- जवाब नहीं हूँ ।।

रुबरू रुह होगी मेरी; तुझसे तो ये पढ़ना।
नंगा सच हूँ ——सस्ती किताब नहीं हूँ ।।

मैं खुशबू हूँ–हिना हूँ; याद–ए-सफीना हूँ ।
नहीं हूँ तो रिश्तों का अजाब नहीं हूँ ।।

उम्र “अनुपम” तमाम ख़र्च यूँ ही होनी थी ।
रंज़ औ—ग़म का मगर हिसाब नहीं हूँ ।।


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10 Comments

  1. Panna - January 15, 2016, 9:31 pm

    bahut khoob sir ji

  2. Rohan Sharma - January 15, 2016, 10:30 pm

    nice

  3. Anjali Gupta - January 15, 2016, 10:43 pm

    beautiful ghazal 🙂

  4. anupriya sharma - January 16, 2016, 4:24 pm

    सुलगता सवाल हूँ—- जवाब नहीं हूँ ।।… behad khoobsurat line 🙂

    • Anupam Tripathi - January 25, 2016, 9:50 pm

      आभार अनुप्रिया जी, आपने गज़ल को मर्म से उठाया है ।

  5. Satish Pandey - September 8, 2020, 11:21 pm

    बहुत ही सुन्दर

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