जीवनदायिनी चीजें ही तो अक्सर
प्रचूरता में जिंदगानी ले लेती है
अग्नि नित सब का चूल्हा चलाती
भोजन को कितना मधुर बनाती
अधिकता में स्वाद को ही मिटाती
अनजाने में घर तक भी जलाती
जल बिन कितना तड़पे हैं मछली
सजीवों की पानी हीं तो है जिंदगी
अधिकता में कितना रौद्र रूप धरती
कितनों का संसार हर साल सूना करती
वायु से है प्रत्येक प्राणी का जीवन
तूफानों ने बदला हर जगह का मौसम
इनसे ही तो होती है जिंदगी की गिनती
श्वांस देने वाली कब सांसों को हरती
प्यार है हर मानव के लिए अमृत
अधिकता से भरता जीवन में विष
नीति है जो पाते वही लुटाते हैं नर
पर पाते कहां से और लौटाते किधर
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