अनमोल सा खजाना

वो नन्ही नन्ही आंखें मुझे निहारती रहती हैं
वो छोटे छोटे हाथों की शरारत ,
और होठों की चिल्लाहट ,
मुझे बुलाती रहती है ।
अब कितना सबर करूं? कि वो मुझे ;
कब पापा कहकर पुकारे,
मेरे अंदर की ये खुशियां मुझे जगाती रहती है!
मेरे अंदर की ये खुशियां मुझे जगाती रहती है।

Comments

12 responses to “अनमोल सा खजाना”

  1. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    खूब

    1. मोहन सिंह मानुष Avatar
      मोहन सिंह मानुष

      🙏🙏🙏

    1. मोहन सिंह मानुष Avatar
      मोहन सिंह मानुष

      Thank you 😊🙏

    1. मोहन सिंह मानुष Avatar
      मोहन सिंह मानुष

      🙏

    1. मोहन सिंह मानुष Avatar
      मोहन सिंह मानुष

      🙏

  2. Satish Pandey

    ‘नन्ही नन्ही आंखें’ ‘छोटे छोटे हाथों’ जैसे सुंदर शब्द युग्मों का प्रयोग हुआ है, वात्सल्य की सुंदर फुहार है

  3. वात्सल्य रस का तथा पुनरुक्ति अलंकार का सुंदर प्रयोग

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