इस महामारी में
हजारों लोग
काल का ग्रास बन गए,
कई परिवारों के
कमाऊ लोग
चल बसे, विलीन हो गए,
झकझोर दिया है
आर्थिक स्थिति को,
बेरोजगार कर दिया है
हजारों लाखों युवाओं को,
सपने चकनाचूर
कर दिए हैं
मानवता के,
रोटी की जरूरत
पहली जरुरत है, इंसान की,
इसलिए आज की विकट परिस्थिति में,
रोटी बटोरने की नहीं
रोटी बांटने की जरुरत है,
असहाय की मदद को
खड़ा होने की जरुरत है,
तभी हम इंसान हैं,
अन्यथा पत्थर हैं
बेजान हैं,
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डॉ. सतीश पांडेय
अन्यथा बेजान हैं
Comments
26 responses to “अन्यथा बेजान हैं”
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सुन्दर
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सादर धन्यवाद पण्डित जी
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शानदार लिखा है सर
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धन्यवाद सर
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Nice Poem
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आदरणीया यादव जी को सादर धन्यवाद
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अच्छी है 🙏
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विद्वान व्यक्तित्व द्वारा की गई सराहना अपनी पूँजी होती है, सराहना हेतु आभार व धन्यवाद
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अरे सर ! ये तो आपका बड़प्पन है, अभी से कहां विद्वान !
अभी तो बहुत कुछ सीखना बाकी है।🙏🙏
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भावपूर्ण रचना
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धन्यवाद गीता जी, आपकी कविताएं भी बहुत स्तरीय हैं, आभार
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धन्यवाद🙏
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अन्यथा बेजान हैं
वाह कितना जबरदस्त लिखा है वाह
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धन्यवाद जी
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nice
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सादर धन्यवाद जी
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Waah Bahut Khoob
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thanks
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वाह जी कमाल
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Thanks
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सुन्दर अभिव्यक्ति
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सादर धन्यवाद
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Waah
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🙏💐
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tatsam tadbhav Shabd ka prayog
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Thanks
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