अपनी कश्ती खुद चलाओ

अपनी कश्ती खुद ही चला कर
दिखदो मंजिल को पास ले आकर
नहीं कुछ भी ऐसा जो तेरे बस में नहीं हैं
कर‌ सकते हो‌, बढ़ो बस ये अहसास जगाकर।
आसान से गर मिल ही गया जो
मोल का अहसास कब‌ कर‌ सकेगे
चुभन का स्वाद गर न‌ लगा तो
हासिल करने का जुनून कैसे पैदा करेंगे
चखेंगे स्वाद जी तोड मेहनत का फल उगाकर
कर सकते हो, बढ़ो बस ये अहसास जगाकर।

Comments

3 responses to “अपनी कश्ती खुद चलाओ”

  1. Satish Pandey

    चखेंगे स्वाद जी तोड मेहनत का फल उगाकर
    कर सकते हो, बढ़ो बस ये अहसास जगाकर।
    ———- बहुत खूब, अति उत्तम रचना।

  2. Geeta kumari

    अपनी कश्ती खुद ही चला कर
    दिखदो मंजिल को पास ले आकर
    नहीं कुछ भी ऐसा जो तेरे बस में नहीं हैं
    __________ उत्साह प्रदान करने वाली बहुत सुन्दर कविता, कवियित्री सुमन जी की अति उत्तम रचना,

  3. बहुत ही सुंदर

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