कविता-अपनी भूख मिटाने के लिए
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भूख मिटाने के लिये,
परिवार चलाने के लिए,
लेबर चौराहे पर जाते हैं,
आतें हैं मालिक कई
मजदूरी की मोल भाव करते हैं |
मजदूरी मिलती ना,
गाली मिल जाती है,
बड़े नसीब से काम मिले,
मालिक तानाशाह ,निकल जाते हैं
मनमानी से काम कराते हैं
सम्मान नही देते हैं,
मजदूर समझ इंसानों को,
गाली दे देकर काम कराते हैं,
महलों में रहने वाले,
मजदूरों की कदर करो,
सोचो जरा मजदूर न होगा,
तुम्हारे घर की सजावट कौन करेगा|
दस मंजिल की बिल्डिंग पर,
एक रस्सी सहारे चढ़ जाते हैं
लटक लटक – झूल झूल कर
पेंटिंग पुट्टी करते हैं,
बड़ा दुख होता उस क्षण उसको,
पत्नी के प्रसवकाल में
जब पैसा ना पाता हैं|
फोन लगाता है,
मालिक पैसा दे दो,
घर में आई बड़ी समस्या हैं,
बिक रहा सब कुछ
बीवी की दवाई में,
पैसे का इंतजाम करो,
डॉक्टर ने फरमान सुनाया हैं|
मजदूरी कुछ कर्ज अभी दे दो,
एक-एक पैसा लौटा दूंगा,
जब लौटे शहर आपके,
आकर बिल्डिंग में काम लगा दूगां,
बेटा दुख है मुझको सुन दुख तेरे,
हजार बचे हैं बस पैसे तेरे,
रामू श्यामू राजू भी मांग रहे हैं,
साहब पैसा दे दो घर वाले मांग रहे हैं,
मजदूर बेचारा
किससे जाएं दर्द सुनाएं,
उम्र गुजारी परदेस में रहकर,
गांव में किससे कर्जा उठाएं
वक्त वक्त की बात हैं यारों,
राजा भी कभी बिक जाए,
आए मुसीबत ना ,दुश्मन घर भी,
नहीं घर का तवा भी बिक जाए,
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**✍ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’——
अपनी भूख मिटाने के लिए
Comments
5 responses to “अपनी भूख मिटाने के लिए”
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बहुत खूब
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Tq
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Tq
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मजदूरों का दर्द बयां करती हुई बहुत ही सुन्दर रचना यथार्थ चित्रण प्रस्तुत किया है कवि ऋषि जी ने
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👌👌👏👏👏
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