अब और नहीं कर देर
देखो फैला कैसा अंधेर
और नहीं भटकाओ
अविलंब चले आओ ।
उम्मीद की कोई पून्ज नहीं
डगर कहाँ, जहाँ तेरी गुन्ज नहीं
विश्वास की डोर बढ़ा जाओ
अविलंब चले आओ ।
तेरा-मेरा कोई ताल्लुकात नहीं
भा जाऊँ, वो मुझमें बात नहीं
चाह मेरे इस हारे मन की
उम्मीद की किरण बन जाओ
अविलंब चले आओ ।
अविलंब चले आओ
Comments
6 responses to “अविलंब चले आओ”
-
सुन्दर रचना
-

बहुत बहुत धन्यवाद
-
-
अतिसुंदर रचना
-

बहुत बहुत धन्यवाद
-
-

बहुत सुंदर पंक्तियां
-

बहुत सुंदर
Leave a Reply
You must be logged in to post a comment.