आइना पूंछता है

आइना पूंछता है
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यह सवाल हर रोज
मानती क्यूं नहीं सलाह मेरा ।
चेहरा वही है
क्यूं वक्त जाया करती है मेरा ‌
निखार आएगा कैसे
वही पहली सी फितरत है तेरा ‌
ज़िद का आवरण कुछ छाया है ऐसा
अच्छाइयों पर लगा बादल घनेरा ।
कुमकुम से रौनक आएगी कब तक
अंन्तर्मन में छाया हो शक का बसेरा ।

Comments

3 responses to “आइना पूंछता है”

  1. बहुत सुंदर रचना

  2. Geeta kumari

    व्यथित ह्रदय की सुन्दर अभिव्यक्ति प्रस्तुत करती हुई कवि सुमन जी की बहुत संजीदा रचना

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