ऐसा नहीं कि हम
तेरे करतूतों से अनजान हैं
पर शिकायत किससे करें
अपनी आदत से हम लाचार हैं ।
चाहते हैं बदल दे खुद को
जवाब दे हर बेअदली का
परेशा हैं समझा के खुद को
अपना ही अरि बनने को तैयार है ।
जनमो-जन्म तक संग चलने को
संग रह, हर तंज, हंस के सहने को
जीवन ही नहीं, जिन्दगी के बाद भी
साथ देने का वादा बेअंजाम है ।
आदत से मजबूर
Comments
6 responses to “आदत से मजबूर”
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सुन्दर अभिव्यक्ति
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अतिसुंदर भाव
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उम्दा अभिव्यक्ति
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बहुत ही सुन्दर रचना है
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सादर आभार
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बेहद सराहनीय रचना
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