आधुनिक नारी ने
तोड़ दी हैं गुमनामी की जंजीरें
बढ़ाई है अपनी ताकत
अपनी मेहनत से पाया है
बुलंदियों का आसमां
कभी खैरात में नहीं मांगी
उसने खुशियां
नारी ने तो हमेशा से त्याग, तपस्या
और बलिदान करके
कमाया अपने हिस्से का हक
आधुनिक नारी आज हर क्षेत्र में
बढ़ा रही है अपना कदम और
लहरा रही है जीत का परचम
उसकी पहल से आज
बदली हैं फिजायें
हवा ने अपना रुख मोड़ा है
आधुनिक परिवेश के साथ ही
नारी ने धूल खाते रिवाजों को तोड़ा है..
“आधुनिक परिवेश और नारी”
Comments
7 responses to ““आधुनिक परिवेश और नारी””
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बहुत सुंदर और यथार्थ परक रचना ।आज नारी घर के साथ साथ बाहरी क्षेत्र में भी पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है ।
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धन्यवाद समीक्षा हेतु
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नारी ने हमेशा से त्याग तपस्या और बलिदान कर इस मुकाम को पाया। खूबसूरत अभिव्यक्ति
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yes,
thank u Sir
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Tq
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सुंदर
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