आपकी बात सुनकर

निरुत्तर हो गए हम
आपकी बात सुनकर
निकल पाया न मुंह से
एक भी शब्द छनकर।
कह दिया आपने सब
कह नहीं पाए थे जो हम,
आपकी बात सुनकर
सोचते रह गए हम।
कभी उस ओर दौड़ा
कभी इस ओर दौड़ा
कहां सच का ठिकाना
खोजता रह गया मन।
आपने सच दिखाकर
बोलती बंद कर दी,
उचित-अनुचित किधर है
समझ सब कुछ गए हम।
आपकी बात सुनकर
निरुत्तर हो गए हम,
कह दिया आपने सब
कह नहीं पाए थे जो हम

Comments

7 responses to “आपकी बात सुनकर”

  1. वाह पाण्डेय जी, बहुत खूब

  2. वाह बहुत खूब, अतिसुन्दर कविता सर

  3. यह कविता मेरी नजर में बहुत ही उच्च भाव समाए हुए है। बहुत खूब लिखा है

  4. Geeta kumari

    मन के भावों का बहुत ही खूबसूरती से वर्णन किया है ।
    बहुत सुंदर अभिव्यक्ति एवम् शानदार प्रस्तुति ।

  5. Vasundra singh Avatar
    Vasundra singh

    काव्य में स्पष्टता का अभाव लगता है

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