आप सदा यूॅं ही मुस्काऍं

आपकी मुस्कान से,
नयनों के दीप रौशन हुए।
महक उठा ऑंखों का काजल,
मुस्कुरा उठे लब मेरे।
मुझसे जुदा होने की बातें,
न करना कभी हमदम।
जुदा होकर आपसे ,
जी कर क्या करेंगे हम।
रब से है यही दुआऍं,
आप सदा यूॅं ही मुस्काऍं॥
____✍गीता

Comments

5 responses to “आप सदा यूॅं ही मुस्काऍं”

  1. Satish Pandey

    रब से है यही दुआऍं,
    आप सदा यूॅं ही मुस्काऍं॥
    —- बहुत ही सुकोमल, लाजवाब और उच्चस्तरीय कविता। भाव प्रधान कविता शिल्प सहित अति उत्तम है।

    1. Geeta kumari

      इस सुन्दर और उत्साहवर्धक समीक्षा के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद सतीश जी ,हार्दिक आभार।

  2. Amita Gupta

    आप सदा यूं ही मुस्कुराए गीता जी
    सुंदर प्रस्तुति

    1. Geeta kumari

      बहुत-बहुत धन्यवाद अमिता जी, हार्दिक आभार आप भी सदा यूं ही मुस्कुराती रहें

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