श्रीराम हरो पीड़ा
मनुज अब सुमिरन करता है।
जहां तहाँ फैली महामारी,
दुखी हुई प्रजा यह सारी,
दूर करो रजनी अंधियारी,
सुमिरन करता है,
मनुज अब सुमिरन करता है।
संकट से घिर गए हैं सारे
तुम न उबारो तो
कौन उबारे,
मानव जाति पड़ी विपदा में,
सुमिरन करता है
मनुज अब सुमिरन करता है।
फैल गया सब ओर रोग है
एक में फैला कई में फैला
रोको अब इस संक्रमण को
सुमिरन करता है,
मनुज अब सुमिरन करता है।
श्वास को तरसा
वायु थम रही,
दम घुटता रह गया मनुज का,
ऐसे में एक आस बने हो,
सुमिरन करता है
मनुज अब सुमिरन करता है।
कवि की कलम शारदा बसती
लेकर आश्रय उनका,
माँ के चरणों में वंदन कर
सुमिरन करता है,
मनुज अब सुमिरन करता है।
कहना सुनना कठिन हुआ है
एक ही अस्त्र बची दुआ है,
आज बता दो
कौन दवा है,
सुमिरन करता है
मनुज अब सुमिरन करता है,
श्रीराम हरो पीड़ा
मनुज अब सुमिरन करता है।
—– डॉ0 सतीश चंद्र पाण्डेय,चम्पावत, उत्तराखंड
मनुज अब सुमिरन करता है
Comments
3 responses to “मनुज अब सुमिरन करता है”
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आज बता दो
कौन दवा है,
सुमिरन करता है
मनुज अब सुमिरन करता है,
________ महामारी के दौर में लिखी गई बहुत सुंदर और सच्ची कविता । लाजवाब अभिव्यक्ति शानदार लेखन -

श्रीराम हरो पीड़ा मनुज अब सुमिरन करता है।(इस महामारी के दौर में अब ईश्वर का ही सहारा है)
सुंदर अभिव्यक्ति सतीश जी🙏🏻🙏🏻 -
अतिसुंदर भाव
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