आया मौसम मानसून का
बरसा है जल रात भर,
लाया पानी कहाँ से इतना
आसमान बादल में भर।
सुबह-सुबह जल्दी उठ चिड़िया
रोजगार की खोज में
चूं-चूं करती दुबकी बैठी
कुछ रुकने की आस में।
चिड़िया सोच रही है मेरे
पास अगर छाता होती
उर की भूख मिटाने मैं भी
दाना चुगने को जाती।
भूखे बच्चे देख घोंसले में
बैठूँ कैसे बैठूँ,
लेकिन बाहर मानसून है
जाऊँ तो कैसे जाऊँ।
आया मौसम मानसून का
Comments
6 responses to “आया मौसम मानसून का”
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चिड़िया का मानवीकरण करके ,कवि ने बहुत ही सुंदर तरीके से रोजगार की परेशानियों का वर्णन किया है…समसामयिक यथार्थ चित्रण प्रस्तुत करती हुई अति उत्तम रचना
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आपने कविता के भाव को समझ कर बहुत सुंदर समीक्षात्मक टिप्पणी की है। आपको बहुत बहुत धन्यवाद गीता जी।
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बहुत सुंदर चित्रण
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बहुत बहुत धन्यवाद
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बहुत सुंदर रचना
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सादर धन्यवाद
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