कहते मेरे है

एक छत है मगर
अलग अलग कमरे है
कही गम कही खुशी कही बेखबरी
सभी अलग अलग चेहरे है
कोई नही जानता रात किसकी कैसी थी
कही हल्के कही गहरे काले घेरे है
उसकी इजाजत से उस तक जाना मुश्किल है जरा
अलग दुनिया है अलग अलग पहरे है
घरौंदे होते थे कभी, अब बस मकान होते है
पसंद का रंग भी नही जानते, कहते मेरे हैं

Comments

6 responses to “कहते मेरे है”

  1. आज कल के माहौल पर आधारित सच्ची रचना

    1. pravin

      🙏🙏

  2. अतिसुंदर रचना 

    1. pravin

      धन्यवाद

  3. वाह क्या बात है

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