इन्सान हूँ इंसान समझो

इस तरह क्यों भेद का
तुम भाव रखते हो, बताओ,
मैं तुम्हारी ही तरह
इन्सान हूँ इंसान समझो।
मुफलिसी है श्राप मुझ पर
बस यही है एक खामी,
अन्यथा सब कुछ है तुम सा
एक सा पीते हैं पानी।
जाति मानव जाति है
धर्म मानव धर्म है
एक सा आना व जाना
फिर कहाँ पर फर्क है।
यह विषमता का जहर अब
फेंक दो इन्सान तुम
सब बराबर हैं, करो मत
भेदगत अपमान तुम।

Comments

10 responses to “इन्सान हूँ इंसान समझो”

  1. Geeta kumari

    बहुत सुंदर भाव है। अमीर गरीब का फर्क मिटाती हुई ज्ञान वर्धक रचना।

    1. Satish Pandey

      इस सुंदर समीक्षा हेतु आपकी प्रतिभाशाली लेखनी को सैल्यूट

    1. Satish Pandey

      Thanks ji

    1. Satish Pandey

      Thank you

    1. Satish Pandey

      सादर धन्यवाद

  2. बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति

    1. Satish Pandey

      बहुत बहुत धन्यवाद

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