आज फ़िर याद आई वो,
एक सखी मेरे बचपन की ।
जब भी मैं उसके घर जाती थी,
कई – कई घंटे बिताती थी ।
समय का पता ही ना चलता था,
छुट्टी का दिन , उसके बिन ,बड़ा खलता था ।
और आज ये आलम है कि…..
गुज़र जाते हैं कई – कई महीने, कई – कई साल,
जान ना पाते एक – दूजे का हाल ।
वो यादें मेरी अमानत, मेरी थाती हैं,
इसीलिए, मुझे बहुत याद आती हैं।
मेरी सखी
Comments
12 responses to “मेरी सखी”
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Very nice
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Thank you
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जबरदस्त
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Thank you very much ☺️
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बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति है।
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बहुत बहुत धन्यवाद एवम् आभार आपका सर🙏
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अतिसुंदर
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सादर आभार भाई जी 🙏
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सुन्दर अभिव्यक्ति
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बहुत बहुत शुक्रिया जी 🙏
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बहुत बढ़िया
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बहुत बहुत धन्यवाद 🙏
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