इश्क-ए-जनून पहूँचा उस मुकाम पे

इश्क-ए-जनून पहूँचा उस मुकाम पे

रूह मेरी को घोल मैंने तेरे जिसम में

तेरे अन्दर करदी दुनिया फना अपनी

                               …… यूई

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2 responses to “इश्क-ए-जनून पहूँचा उस मुकाम पे”

  1. उम्दा रचना है आपकी 

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