कोई गरीबी का मारा ,
कोई बदनसीबी का मारा ,
कोई वक्त से परेशान हैं ,
कोई अपनों का मारा ।
मगर वो बेपरवाह सा,
मगन अपने दर्द में,
जो है इश्क का मारा।
इश्क का मारा (शायरी)
Comments
8 responses to “इश्क का मारा (शायरी)”
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वाह वाह
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धन्यवाद सर
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वाह ,क्या बात है
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बहुत आभार मैडमजी 🙏
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Welcome
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बहुत ही सुंदर
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बहुत-बहुत आभार 🙏 सर
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बहुत ही उम्दा
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