खूबसूरती को तुम्हारी,
क्या नया उपमान दूँ,
उपमान तो कितने ही
बेहतर दूं ,भले न दे सकूँ
लेकिन इतना तो कर सकूं कि
घर के बाहर व भीतर
तुम्हें उचित सम्मान दूं।
उचित सम्मान दूं
Comments
16 responses to “उचित सम्मान दूं”
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बहुत खूब
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बहुत बहुत धन्यवाद
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वाह सर, जीवन साथी की सराहना के नए उपमान और घर और बाहर उचित सम्मान देना आपकी लेखनी की अनूठी विशेषता का ही परिचायक है । लेखनी को प्रणाम है सतीश जी..
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आपके द्वारा की गई समीक्षा अति उत्साहवर्धक है, गीता जी, आपकी इस लेखनी को अभिवादन। बहुत सुंदर समीक्षा करती हैं आप।
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🙏🙏
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वास्तव में बहुत बेहतरीन लिखती हैं गीता मैम
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कविता तो लाजवाब है ही, लेकिन बात आपकी काबिलेतारीफ समीक्षा की है, जो हर किसी की कविता में फिट बैठती है।
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Thank you very much Chandra mam..
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बहुत खूब कविता
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सादर धन्यवाद जी
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उच्च कोटि।
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सादर धन्यवाद
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वाह वाह क्या कहने
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सादर धन्यवाद शास्त्री जी
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Nice poem
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Thank you ji
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