दिल में हैं मेघ उमड़ते
जब-जब तेरी यादों के
बरस पड़ें तब-तब पानी
ओ साजन ! मेरी आँखों से
रिमझिम-रिमझिम
रुनझुन-रुनझुन
झननन- झननन-झनन-झनन!
अब तो मोरे साजन आजा
कब से रस्ता देख रही
तेरी तस्वीरों से मैं तो
अपनी अँखियां सेंक रही..
उमड़ते मेघ…
Comments
5 responses to “उमड़ते मेघ…”
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कवि प्रज्ञा जी की प्रेम से परिपूर्ण अति सुन्दर कविता ।
अनुप्रास अलंकार ने इसकी छटा में चार चांद लगाए हैं
बहुत ही भावपूर्ण प्रस्तुतिकरण.-

Thanks di
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अतिसुन्दर रचना
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Thanks
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अतिसुंदर भाव
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