उम्मीदों का पुलिंदा

उम्मीदों ने ही किया घायल
और उम्मीदों पे ही जिंदा था,
इस उम्मीद- ए- जहां का
मै एक मासूम परिंदा था।।

कूट के भरा था दिल में प्यार
प्यार का मै बंदा था,
सादगी की सादी चादर औढे
मासूमियत का मै पुलिंदा था,

पर ना था महफूज शायद
जमाना मेरी उम्मीदों के लिए,
यहां तो ये मासूमियत बस
शातिर लोगो को धंधा था।।

ना कद्र मेरी उम्मीदों की
ना मासूमियत को प्यार मिला,
ये सब तो इस जमाने में
मानो गरीब का चन्दा था।।

तब तक मरता ही रहा
जब तक मै जिंदा था,
इस उम्मीद- ए- जहां का
मै एक मासूम परिंदा था।।
AK

Comments

14 responses to “उम्मीदों का पुलिंदा”

  1. Geeta kumari

    वाह, बहुत सुंदर

    1. धन्यवाद् जी

    1. Anuj Kaushik

      Thanks

    1. Anuj Kaushik

      Thanks

  2. सुन्दर अभिव्यक्ति

    1. Anuj Kaushik

      धन्यवाद् जी

    1. Anuj Kaushik

      धन्यवाद् जी

    1. Anuj Kaushik

      धन्यवाद् सर

    1. शुक्रिया आपका

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