उम्मीदों के बीज

चलो आज अपनी तन्हा जिन्दगी को नया रूप देते हैं
सशंकित ह्रदय में फिर से नव उम्मीदों के बीज बोते हैं ।
रोज की भागदौड़, दोहरे कामों से मन है बेहाल
घर-बाहर की जिम्मेदारियां, फिर भी उठते सवाल
अब भी ठहरो, खुद को समझो, खुद को वक्त देते हैं
सशंकित ह्रदय में, फिर से उम्मीदों के बीज बोते हैं ।
वो बचपन के दिन, माटी के कच्चे सात घङकुल्ले
सात मिठाइयाँ, सतन्जा, सात रंगीले मिट्टी के खिलौने
उल्लास के पलों की तरह,जीवन को सातरंग देते हैं
सशंकित ह्रदय में फिर से उम्मीदों के बीज बोते हैं ।
घरेलू कपङो से बने अद्वितीय गुड्डे-गुड़िया का खेल
खेल-खेल में भी था कैसा वास्तविकता का अद्भुत मेल
खिलखिलाहटो के साथ फिर से नव संसार रचते हैं
सशंकित ह्रदय में फिर से उम्मीदों के बीज बोते हैं ।।

Comments

3 responses to “उम्मीदों के बीज”

  1. Geeta kumari

    सुन्दर अभिव्यक्ति

  2. सुन्दर अभिव्यक्ति

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