उम्मीद की कश्ती

हमने ज़माने से पूछा
मैं बदनामी का बहुत बड़ा धब्बा हूँ
क्या आपके शहर में पनाह मिलेगा
मैं उम्मीद की कश्ती पे
सेहरा बांध के आया हूँ
ज़माना हंसते हुए कहा —- अरे यार
सतयुग गया कलयुग गया
इस भ्रष्टयुग में भी जनाब
अंधेरे में लाठी चलाते हो
क्यों तुम अपनी ज़मीर को
हमारे ज़माने के बही में
नामांकन कराना चाहते हो
मैं बुत बन कर कहा —
अच्छा, अब मैं चलता हूँ।

Comments

5 responses to “उम्मीद की कश्ती”

  1. विचारणीय

  2. मोहन सिंह मानुष Avatar
    मोहन सिंह मानुष

    सुन्दर अभिव्यक्ति

  3. सुन्दर अभिव्यक्ति

  4. Geeta kumari

    सुंदर रचना

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