उर्मिला और लक्ष्मण:- हे उर्मिल

मेरी मनसा थी यहाँ
बोना प्रेम के बीज
पर उग आया है यहाँ
काँटा बन कर विष
काँटा बन कर विष
उगा है यहाँ पर जबसे
ना आए हैं साजन हे सखि !
यहाँ तभी से
बोली सखि हे उर्मिल !
ना तू आपा खोना
आएगे लक्ष्मण तू ना
सुध अपनी खोना
जब आएगे वह तो
कंटक भी खिल जाएगे
हे उर्मिल ! साजन तेरे
जल्दी घर आएगे…

Comments

7 responses to “उर्मिला और लक्ष्मण:- हे उर्मिल”

  1. Satish Pandey

    बहुत खूब, अति उत्तम

  2. Geeta kumari

    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

  3. vivek singhal

    This comment is currently unavailable

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