मुझको निगोड़े ने
न सोने दिया।
डी जे बजाया
और भँगरा किया।।
रात भर मुझको
न सोने दिया।
बड़ी मुश्किल से
थोड़ी- सी आँखें लगी।
ख्वाब में भी आए
और एक सूई लगी।।
ख्वाब को भी न उसने
पूरा होने दिया।।
रात भर मुझको
न सोने दिया।।
सुबह हो गई
यूँही जाग जागकर।
फिर भी कहीं
गया न वो भागकर।।
नींद छाई थी
अँखियों में न ढोने दिया।।
रात भर मुझको
न सोने दिया।।
एक हाथ मोबाइल
और दूजे में चाय का प्याला।
लेकर चुस्की एक
सावन को लाॅग इन कर डाल।।
न लिखने दिया
न हीं पढ़ने दिया।।
पर एक *मच्छर *
‘विनयचंद ‘को कवि बना दिया।।
एक ******कवि बना दिया
Comments
6 responses to “एक ******कवि बना दिया”
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बहुत सुंदर हास-परिहास युक्त रचना। वाह शास्त्री जी
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सही है ऐसा ही है मेरी कालोनी में तो अभी से दिवाली आ गई
पटाके सोने नहीं देते..
मच्छरदानी का प्रयोग करें तथा ओडोमॉस लगाएं
नाचकूद कर मच्छर को दूर भगाए -
वाह भाई जी मच्छर ने इतना परेशान किया फिर भी कवि बनने का श्रेय आप उसे है दे रहे हैं, मैं तो नहीं मानती ।मच्छर खामखां खुश हो रहा होगा सुबह से कि उसने शास्त्री जी को कवि बना दिया ।शान मार रहा होगा दोस्तों में ।….. हा हा हा.बहुत ही सुन्दर कविता है भाई जी ।बहुत हंसी आई पढ़ कर ।
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सुन्दर
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वाह✍👌
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