एक बेटी की करुण पुकार

क्यूँ आई दुनिया में मैं मां ,
जब जिल्लत जग की सहना था ,
मानव समाज के नियमों के ,
ताने बाने में रहना था ।
गर बेटा मैं भी होती तो ,
मेरा मन यूं क्रंदन ना करता ,
गर लाल तूने जाया होता ,
यह घर खुशियों से तेरी झोली भरता ,
घर वालों के तानों से मां,
तेरा मन छलनी ना होता ,
मिलते तुझको सुख के साधन ,
गर जन्म मेरा इस जग में ना होता ।
मत इतरा इतना ऐ इंसान तू,
एक बात मैं तुझको बतला दूं ,
मुझसे ही है अस्तित्व तेरा,
यह परम सत्य ना ठुकरा तू,
बेटियां जो जग में ना होंगी ,
तो बहू कहां से लाओगे ,
अपनी अस्मिता बचाने को ,
अपना वंश कैसे बढ़ाओगे ??

Comments

9 responses to “एक बेटी की करुण पुकार”

  1. राकेश पाठक

    बेटियाँ पावन दुआएं हैं

  2. बेटियों के बिना जग का कोई आस्तित्व ही नही बहुत सुंदर पंक्तियां

  3. Arpit Gupta

    बेटियां जो जग में ना होंगी तो बहू कहां से लाओगे,
    अपनी अस्मिता बचाने को अपना वंश कैसे बढा़ओगे,
    बेटी की करुण पुकार को व्यक्त करते हुए बहुत मार्मिक रचना

  4. उच्चस्तरीय साहित्यिक रचना। बहुत खूब

  5. बेटियों के लिए बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति

  6. Amita Gupta

    उत्साहवर्धक समीक्षा हेतु आप सभी का धन्यवाद।

  7. Raunak Srivastava

    Apratin

  8. vikash kumar

    Great

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