एक बेटी

एक घर में जन्म लिया तो
दूजे घर में ब्याही गई
एक घर मे पाली बड़ी हुई
दूजे घर की रानी बनी
एक घर में खेली कूदी तो
दूजे घर की रखवाली बनी
एक घर में शरारती रही तो
दूजे घर मे सयानी बनी
एक घर में पढ़ लिख पाई तो
दूजे घर में कमाई में लगी
एक घर में संस्कारी बनी तो
दूजे घर संस्कार देने में लगी
एक घर सब कुछ सीखा तो
दूजे घर जिम्मेदारी में लगी
एक घर में बचपन छोड़ा तो
दूसरे घर में ताउम्र रही
लेकिन वो एक नन्ही सी कली
दोनों घर का मान रही।।

Comments

8 responses to “एक बेटी”

  1. Praduman Amit

    आप की सोच बिल्कुल सही है। कविता अच्छी बनी है।

  2. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    सुंदर भाव चित्रण

  3. Priya Choudhary

    Bhut sunder 👏👏👏👏

  4. Antariksha Saha Avatar
    Antariksha Saha

    खूब

  5. Neha Avatar
    Neha

    आप का धन्यवाद

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