एहसास

क्यों झर-झर बहती आंखों में यूं आंसू बनकर आते हो,
और सूखी पत्ती जैसे दूर चले भी जाते हो
एहसास मेरा है नहीं तुम्हें क्या यही जताते रहते हो
और चलने वाली हवा में पानी सा बहते रहते हो
एक बूंद पड़ी दिल सिहर उठा जैसे की बारिश आती हो
पर नहीं पता वो पानी था या केवल एक छलावा था
महसूस किया जिसको मैंने, वो सपना सच था कभी नहीं
इस दुनिया में गम देने वालों की कमी रही है कभी नहीं
बढ़ती हूं मंजिल की तरफ़ फ़िर दिखती मंजिल कहीं नहीं
मिलने वाली हर चीज मिली जब सांस मेरी ही रही नहीं
याद सफ़र आया मुझको जब साथ मेरे तुम चलते थे
पर क़दम-क़दम चलते चलते तुम अपना रंग बदलते थे।

Comments

19 responses to “एहसास”

  1. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    अतिसुंदर हृदयक भाव

    1. Kanchan Dwivedi

      धन्यवाद

    1. Kanchan Dwivedi

      Thanks dear

  2. Pragya Shukla

    Sahi kaha

    1. Kanchan Dwivedi

      ,😍

    1. Kanchan Dwivedi

      Thanks

    1. Kanchan Dwivedi

      Thanks,🙏

  3. Amod Kumar Ray Avatar
    Amod Kumar Ray

    👌👌

    1. Kanchan Dwivedi

      Thanks 🙏

  4. Poonam Agrawal Avatar
    Poonam Agrawal

    Gjb se bhi Gjb

    1. Kanchan Dwivedi

      Thankyou ji

  5. Anil Mishra Prahari

    बहुत सुन्दर रचना।

  6. Kanchan Dwivedi

    Thanks

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