ऐसा श्रृंगार धरो

नुपुर तुम्हारी शोभा नहीं
ज्ञान को अंगीकार करो
शक्ति रूप तुम धर कर के
पाश्विक प्रवृत्ति का संघार करो।
सिर्फ सदन तक तेरी शोभा नहीं
विशाल गगन तुम्हारा आँगन है
अपने आकांक्षाओं को पंख लगा
कर्मठ बन, खुद का निर्माण करो।
सृजन की बीज की धात्री हो तुम
तपस्विनी हो, नहीं सिर्फ मातृ तुम
खुद की निर्मात्री भी बनने को
हर रूढ़िवादिता का तिरस्कार करो।
अवनी सी धीर, तू धरते आई
व्योम से भी रिश्ता जोङ आई
हर क्षेत्र में तेरी पहुँच बन जाए
तू खुद का विद्या से ऐसा श्रृंगार करो।

Comments

5 responses to “ऐसा श्रृंगार धरो”

  1. वाह सुमन जी..
    सुंदर शब्द चयन व भाव प्रगढ़ता

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