कब के बुझ चुकी

वो जगह छूटी
वो लोग छूटे,
वो मन की लगी
कब के बुझ चुकी,
वो चाहत
बहुत दूर जा चुकी,
वो गलियां अब
बेगानी हो चुकी
फिर भी नजरें
उस ओर पडते ही,
आँसू टपक पडे,
वो आँसू
माटी के भाव बिक गये।

Comments

6 responses to “कब के बुझ चुकी”

  1. बहुत सुंदर और भावुक रचना की है सर आपने

  2. बहुत खूब, बहुत बेहतरीन

  3. Geeta kumari

    “फिर भी नजरेंउस ओर पडते ही,आँसू टपक पडे,
    वो आँसूमाटी के भाव बिक गये।’
    कवि की भाव विह्वल कर देने वाली बहुत ही ख़ूबसूरत पंक्तियां हैं , ऐसी कि पाठक की भी आंखें नम हो जाएं कवि के कोमल हृदय ने कुछ पुरानी बातो को याद किया है।उसी के सन्दर्भ में बेहतरीन शिल्प के साथ बहुत ही सुन्दर और भावुक कविता

  4. अतिसुन्दर

  5. Rishi Kumar

    वाह सर बहुत सुंदर 👌👌👌

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