कब रुकेगा

संतापों क्रम यह
कब बदलेगा,
मानव जाति पर आया
संकट कब निपटेगा।
हा हा कार, चीत्कार
विभत्स करुण क्रंदन
कब रुकेगा,
ओ प्रकृति !!
तेरा यह आक्रोश
कब थमेगा।
लाखों जीवन लील चुका
यह विनाश का मंजर
कब थमेगा।
मानव जाति पर यह
अदृश्य खंजर
कब तक चुभेगा।
अस्त-व्यस्त है जिन्दगी
असहाय सी है
संभल रही है
बिखर रही है,
फिर फिर बिखर रही है
यह बिखराव
कब चलेगा,
ओ प्रकृति !
तेरा यह रौद्र रूप
कब तक रहेगा।

Comments

6 responses to “कब रुकेगा”

  1. Geeta kumari

    मानव जाति पर यह
    अदृश्य खंजर
    कब तक चुभेगा।
    अस्त-व्यस्त है जिन्दगी
    _____________ कोरोना की दूसरी लहर से प्रभावित जनजीवन पर कवि की ठहरी है नजर, अदृश्य जीवो का यह खंजर कब तक मनुष्य के जीवन पर चलता रहेगा….. समसामयिक यथार्थ चित्रण प्रस्तुत करते हुए कवि सतीश जी की एक सच्ची प्रस्तुति। उम्दा लेखन

  2. संतापों क्रम यह
    कब बदलेगा,
    मानव जाति पर आया
    संकट कब निपटेगा।
    हा हा कार, चीत्कार
    विभत्स करुण क्रंदन
    कब रुकेगा,

    बहुत सुंदर रचना 🙏

  3. सही कहा सर

    ये मंजर
    डराने वाला
    कब तक चलेगा

  4. कोरोना पर बिल्कुल सच्ची कविता

  5. यथार्थ चित्रण

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