*कर्म*

कर्म ही जीवन का सार,
कर्म ही प्राणों का आधार
कर्म करते हुए हो इच्छा,
सौ वर्ष तक जीने की
कर्म नहीं तो इस दुनियां में
जीना है बिल्कुल बेकार
कर्म,परिश्रम नहीं हुआ तो,
जीवन में ना रुके बहार
कर्म पूजा, कर्म आराधना,
कर्म ही है तेरी साधना
कर्म ,परिश्रम कर मनुज तू
“गीता” की तो यही कामना..

*****✍️गीता

Comments

6 responses to “*कर्म*”

  1. वाह वाह गीता जी, बहुत स्तरीय कविता है, कर्म ही जीवन है, कर्म के पथ पर अग्रसर राही जरूर मंजिल प्राप्त करते हैं। सादर अभिवादन

    1. Geeta kumari

      इस सुन्दर और उत्साह वर्धक समीक्षा हेतु आपका बहुत बहुत धन्यवाद सतीश जी
      सादर अभिवादन सर 🙏

    1. Geeta kumari

      शुक्रिया जी

  2. बहुत अच्छा है👌

    1. Geeta kumari

      धन्यवाद ऋषि

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