चाहती हूँ एक कविता लिखना
मगर नाकाम हो जाती हूँ
विषय चुनने के लिए
छटपटाती हूँ
शब्द कुछ ऐसे हों
भावनायें मेरी व्यक्त करें
और कह दें
वह जो मैं कह नहीं पाती हूँ
निरर्थक है लेखन
जब तक भाव ना सिमटें
कविता में,
पल्लवित ना हों इरादे
प्रस्फुटित ना हों आकांक्षाएं और
ना चल पायें
मेरी मनमर्जियां….
कविता: मनमर्जियाँ
Comments
8 responses to “कविता: मनमर्जियाँ”
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बहुत खूब, उम्दा पंक्तियाँ
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Thanks
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रचनाकार की छटपटाहट का रचना के माध्यम से सटीक अभिव्यक्ति
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शुक्रिया
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बहुत खूब
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धन्यवाद
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धन्यवाद
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